Monday, November 29, 2021

हमेशा खुश रहना सीखें

1. सही सोच रखें

हम जीवन में सब कुछ नहीं पा सकते हैं। दुनिया में जो कुछ है उसमें से सब कुछ हमारा नहीं है। जिंदगी ने हमें जितना दिया है इतना काफी होना चाहिए।


हमारा यह सोचना कि सब हमारा है, यह गलत है। हमें ऐसी सोच नहीं रखनी चाहिए। जो लोग ऐसा सोचते हैं वह कभी भी दुखी नहीं होते हैं और अपनी लाइफ में बहुत ही खुश होते हैं।

2. दिल की बात सुने

हमेशा दिमाग की ना सुन के कभी-कभी दिल की बात सुने। भले ही दिल से लिए गए निर्णय गलत हो लेकिन हमें उनका अफसोस नहीं होता, क्योंकि हमने जो कुछ किया दिल से किया था।

अफसोस तब करना चाहिए जब आपने किसी के कहने पर या थोपे गए निर्णय लिए हो। इसलिए एक अच्छी जिंदगी जीने के लिए हमें निर्णय खुद से और दिल से लेना चाहिए।

3. किसी चीज की जिद ना करें

हम जो कुछ सोचते हैं, जो कुछ चाहते हैं वह सब कुछ हमारा नहीं हो सकता। यह बात आप जितनी जल्दी समझ लोगे उतना ही बेहतर होगा और तभी आप अपनी जिंदगी में खुश रह पाओगे।

माना कि जब हमें मनचाही चीज नहीं मिलती है तो बहुत दुख होता है लेकिन हमें समझना होगा कि हर चीज के अपने उसूल होते हैं और हमें उसकी फिक्र ना करके आगे बढ़ना है।

4. अपनी अच्छाइयों को पहचाने

हो सकता है आप में बहुत सी कमियां हो, लेकिन यह भी सच है कि आपमें बहुत सी अच्छाईया भी होंगी। आपको अपनी उन्हीं अच्छाइयों के बल पर बेहतर जिंदगी जीने की कोशिश करनी चाहिए।

बहुत से लोग होते हैं जो हमेशा अपनी कमियों को याद करके दु:खी रहते है और हमेशा नकारात्मकता से घिरे रहते हैं। आपको ऐसा नहीं करना है और सकारात्मक के साथ जीना है।

5. खुद की तुलना दूसरों से ना करें

आपको बता दें कि दुनिया का हर एक इंसान अपने आप में स्पेशल होता है, हर किसी में अलग खूबियां होती हैं। बस जरूरत होती है तो उन्हें पहचानने की, फिर जीवन में खुशियां ही खुशियां होती है।

जो लोग ऐसा करते हैं वह हमेशा तनाव से घिरे रहते हैं, क्योंकि संसार के सभी लोग एक जैसे नहीं हो सकते हैं। इसलिए कभी भी खुद की दूसरों से तुलना ना करें। आप जैसे भी हैं, बहुत अच्छे हैं।

6. अपनी सेहत का ख्याल रखें

"पहला सुख निरोगी काया" यह कहावत तो आपने सुनी ही होगी। आपको इसकी समझ होनी चाहिए कि आपका स्वस्थ रहना ही जीवन में खुश रहने का सबसे बेहतरीन तरीका है।

कमजोर और बीमार व्यक्ति तो अपनी जिंदगी का आधे से ज्यादा समय डॉक्टर के पास आने जाने या दवा खाने में ही बिता देते हैं। आपको अपने आप को शारीरिक और मानसिक रूप से फिट रखना चाहिए।

7. हमेशा कुछ हटकर करें

हम आपको यह नहीं कह रहे हैं कि आप को कुछ नया करना है, हम सिर्फ यह कह रहे हैं कि आपको बस सब से अलग करना है या फिर सबसे अलग तरीके से करना है।

भले ही आप कोई भी काम करें बस आपको उसी काम को करने वाले लोगों से बेहतर तरीके से करना है। इससे सभी लोग आपको पसंद करेंगे और आप हमेशा खुश रहेंगे।

8. हमेशा मुस्कुराते रहें

इमोशनल भावनाओं के साथ जिंदगी नहीं जी जा सकती है। अच्छा जीवन जीने के लिए आपको हमेशा मुस्कुराते रहना चाहिए, फिर भले ही आपकी लाइफ में कितने भी दुख क्यों ना हो।



इससे ना सिर्फ आपको खुशी मिलेगी बल्कि आपके दोस्तों, परिवार और आसपास के लोगों को भी यह प्रेरणा मिलेगी की आप हर परिस्थिति में मुस्कुराते रहते हैं।

9. अपने आप से प्यार करें

आपको बता दें कि दुनिया में सबसे ज्यादा वही लोग खुश होते हैं जो खुद से मोहब्बत करते हैं। ऐसे लोगों को किसी और की जरूरत नहीं होती है, वह बस अपने आप में मस्त रहते हैं।

उन्हें दुनिया की परवाह नहीं होती, ऐसा नहीं है कि वह किसी की चिंता नहीं करता है, लेकिन बस उन्हें अपने आप को खुश रखने के लिए किसी और की जरूरत महसूस नहीं होती है।

10. समय के साथ सब सही होगा

जीवन में कितनी भी बड़ी मुसीबत क्यों ना आ जाए। कितना भी बुरा वक्त आ जाए, कितनी भी समस्याएं हो। आपको हमेशा सोचते रहना चाहिए कि समय के साथ सब सही हो जाएगा।

Tuesday, October 12, 2021

छप्पनिया-काळ विक्रम संवत १९५६ (1956) (1899-1900)

वर्ष 1899-1900 में राजस्थान में एक बदनाम अकाल पड़ा था...

विक्रम संवत १९५६ (1956) में ये अकाल पड़ने के कारण राजस्थान में इसे छप्पनिया-काळ कहा जाता है...


एक अनुमान के मुताबिक इस अकाल से राजस्थान में लगभग पौने-दो लाख लोगों की मृत्यु हो गयी थी...
पशु पक्षियों की तो कोई गिनती नहीं है...
लोगों ने खेजड़ी के वृक्ष की छाल खा-खा के इस अकाल में जीवनयापन किया था...

यही कारण है कि राजस्थान के लोग अपनी बहियों (मारवाड़ी अथवा महाजनी बही-खातों) में पृष्ठ संख्या 56 को रिक्त छोड़ते हैं...
छप्पनिया-काळ की विभीषिका व तबाही के कारण राजस्थान में 56 की संख्या अशुभ मानी है....

#तब इंसान ही इंसान को खाने को हुआ था मजबुर

#1899 का विभत्स काल
" #छप्पना_रो_काळ अर मारवाड री दशा "

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प्रकृति के प्रकोप को मनुष्य सदियों-सदियों से ही झेलता आया हैं | इसका असर कभी कम तो कभी-कभी क्षेत्र के सम्पुर्ण जनजीवन को मौत के मुंह तक ले जाना वाला रहा हैं |
ऐसा ही प्रकृति का प्रकोप #सन्1899 में हुआ था | जिसे 'छप्पना रो काळ' कहा जाता हैं | आज भी उस काळ में हुई दशा के बारे में सुनाने वाले बुजुर्ग कांपने लगते हैं | क्योकि उनके बाप-दादा जो उस काळ के प्रकोप से येन-केन प्रकारेण बच गये थे, वो उन्हें काळ में हुई दशा के बारे में बताते थे |
इस वर्ष उत्तरी भारत के अन्य प्रांतो में भी घोर अकाल था | सामान्यत: मारवाड के लोग विशेषकर कृषक व पशुपालक अपने परिवार व पशुओ सहित अकाल के समय मालवा, उत्तर प्रदेश व सिंध की ओर चले जाते थे | लेकिन इस वर्ष यहां भी अकाल था, अतः इन्हें निराश होकर वापस लौटना पडा़ | लगभग चौदह लाख मवेशी मर गये, जो यहां के मवेशीयों की आधी संख्या थी | राज्य सरकार ने काफी चारा व धान बाहर से मंगवायां, लेकिन यातायात की पर्याप्त सुविधाएं न होने के कारण काफी मवेशी व मनुष्य मर गये | कहा जाता हैं कि इस काळ का इतना प्रकोप हुआ की झोपडी से लेकर महल के निवासी सडको पर आ गये और दानें-दानें के मोहताज हो गये | ये काल सब से लिए आफत भरा था | राज्य सरकार ने इस वर्ष लगभग सवा छत्तीस लाख खर्च कीये | राज्य ने अकाल के समय तथा उसके बाद के प्रभाव को दूर करने के लिए अंग्रेजी सरकार से तीस लाख रूपये का कर्जा लीया था | राज्य की आर्थिक स्थति काफी गिर गई | मंहगाई लगभग 25 प्रतिशत तक बढ गई थी | जोधपुर शहर में 25 अगस्त, 1899 को अनाज के भाव इस प्रकार हो गये- गेहूं 6सेर , बाजरी 6.5 सेर, जवार 8सेर, मूंग 4 सेर व घास 11 सेर तक हो गई थी | भयंकर अकाल के कारण जोधपुर में लूटखसोट चालू हो गई थी | इस कारण सभी महकमों की तिजोरियां महकमा खास में रखवाई गई थी | और इस तरह मई-जून 1900 में गर्मी की अधिकता के कारण तथा अकाल से कमजोर हुएं लोगो को हैजा का शिकार होना पडा़ | हजारो लोग हैजे के कारण मर गये | इस वर्ष वर्षा भी अधिक हुई व खेतो में फसलें भी अच्छी हुई, लेकिन फसल काटने वाले ही नही थे | इसलिए इस वर्ष भी धान की कमी रही | अकाल, हैजा व मलेरिया के प्रकोप के कारण 1901 की जनगणना के अनुसार यहां की आबादी 19,38,565 रह गई | जबकि 1891 की जनगणना में मारवाड की जनसंख्या 25,28,178 थी | इस प्रकार 1899 व 1900 इन दो वर्षो में यहां की सामाजिक व आर्थिक स्थति अत्यंत दयनीय हो गई थी |
इसी वर्ष जोधपुर महाराजा सरदार सिंह जी ने अपनी जनता को अकाल से राहत व रोजगार देने के लिए बाडमेंर-बालोतरा 60 मील रेल लाईन चालु करवाई गई | इतनी बडी रेल लाइन चालू करने की अनुमती अंग्रेजी सरकार ने पहली बार एक देशी रियासत को दी थी | इस अकाल में जोधपुर महाराजा ने अपनी प्रजा के लिए धान के भंडार खोल दिये थे, लेकिन भयंकर अकाल में कुछ ही समय में चौतरफा त्राही-त्राही मच गई |
इस काळ को लेकर उस समय की दशा को महाकवि ऊमरदान ने इस तरह बताया -
"माणस मुरधरिया माणक सूं मूंगा !
कोडी कोडी़ रा करिया श्रम सूंगा !
डाढी मुंछाला डळियां में डळिया !
रळिया जायोडा़ गळियां में रूळिया !
आफत मोटी ने रैय्यत रोवाई !
अर्थात मरूधर के मनुष्य (मारवाडी) जो मणिक और मुंगा आदि रत्नों के समान महंगे थे, जो एक-एक कोडी़ को मजदुरी करते दिखाई दिये | गर्व भरी डाढी- मुंछों वाले टोकरी उठाते थे | महलों में पैदा होने वाले गलियों में भटक रहे थे | वह छप्पन का समय भारी आफत के साथ आया ! प्रजा रोटी-रोटी को रोती रही |
कहते हैं उस वक्त धान की अत्यंत कमी के कारण नीम व खेजडी की साल तक खाने को मजबुरी आ पडी थी | इस बारे में मैंने गांव के बुजुर्गों से जानकारी ली, तो बताया की उनके पुर्व के बुजुर्ग जो उस काळ को चीर कर बाहर निकले थे | वो बताते थे की "छप्पने" के समय लोगो के पास पैसे व सोने चांदी की मुहरे भी थी, लेकिन वो भी इधर-उधर लेकर घुमते रहे | धान की इतनी कमी थी कि स्वर्ण मुहरो के बदले भी कोई धान देने को तैयार नही था | क्योकि जिनके पास धान था वो खुद चिंतित थे, कि न जाने काळ कीतना लंबा चलेगा |
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छप्पनियां काळ के बारे में बुजुर्गों से सुने अनुभव शेयर करते हुए मंगलाराम बिश्नोई बताते हैं कि -
" लोग अनाज की पोटली हांडी में घुमाकर उसे 'अन्नवाणी' बना देते और उस पानी में खेजडी के 'छोडा ' (छाल) उबाल कर खाते |
लोग इतने कमजोर पड गये थे कि घरों में झोंपडों में अंदर 'वळों" से रस्सी लटकाये रखते और उसे पकड कर ही खडे हो पाते थे |
एक वीभत्स किस्सा भी है-
" एक माँ ने कैरडे के मळे में अपनी संतान को जन्म देकर खुद ही खा लिया |"
और मंगलाराम जी कहते हैं कि मारवाड की मानवता को झकझोर कर रखने वाली इस छप्पनिया की विभीषिका के बारे में किसी साहित्यकार, कवि, ख्यात लेखक की कलम नहीं चली, न ही वाणी में सरस्वती विराजी |
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आज जब हम प्रकृति के छोटे-छोटे प्रकोप से डर व सहम जाते हैं | तब बुजुर्गो से सुनते आये उस छप्पने काळ की याद अनायास ही आ जाती हैं | क्या दौर रहा होगा ? जब सब तरफ त्राही-त्राही मची होगी |
खैर प्रकृती करे ये काळ व ये आपदाये कभी ना आये |

इस दौर में बीकानेर रियासत के यशस्वी महाराजा थे...
गंगासिंह जी राठौड़(बीका राठौड़ अथवा बीकानेर रियासत के संस्थापक राव बीका के वंशज)....

अपने राज्य की प्रजा को अन्न व जल से तड़प-तड़प के मरता देख गंगासिंह जी का हृदय द्रवित हो उठा....

गंगासिंह जी ने सोचा क्यों ना बीकानेर से पँजाब तक नहर बनवा के सतलुज से रेगिस्तान में पानी लाया जाए ताकि मेरी प्रजा को किसानों को अकाल से राहत मिले...

नहर निर्माण के लिए गंगासिंह जी ने एक अंग्रेज इंजीनियर आर जी कनेडी (पँजाब के तत्कालीन चीफ इंजीनियर) ने वर्ष 1906 में इस सतलुज-वैली प्रोजेक्ट की रूपरेखा तैयार की...

लेकिन....
बीकानेर से पँजाब व बीच की देशी रियासतों ने अपने हिस्से का जल व नहर के लिए जमीन देने से मना कर दिया....
नहर निर्माण में रही-सही कसर कानूनी अड़चनें डाल के अंग्रेजों ने पूरी कर दी...

महाराजा गंगासिंह जी ने परिस्थितियों से हार नहीं मानी और इस नहर निर्माण के लिए अंग्रेजों से एक लंबी कानूनी लड़ाई लड़ी और जीती भी...

बहावलपुर (वर्तमान पाकिस्तान) रियासत ने तो अपने हिस्से का पानी व अपनी ज़मीन देने से एकदम मना कर दिया...

महाराजा गंगासिंह जी ने जब कानूनी लड़ाई जीती तो वर्ष 1912 में पँजाब के तत्कालीन गवर्नर सर डैंजिल इबटसन की पहल पर दुबारा कैनाल योजना बनी...

लेकिन...
किस्मत एक वार फिर दगा दे गई...
इसी दरमियान प्रथम विश्वयुद्ध शुरू हो चुका था...

4 सितम्बर 1920 को बीकानेर बहावलपुर व पँजाब रियासतों में ऐतिहासिक सतलुज घाटी प्रोजेक्ट समझौता हुआ...

महाराजा गंगासिंह जी ने 1921 में गंगनहर की नींव रखी...

26 अक्टूम्बर 1927 को गंगनहर का निर्माण पूरा हुआ....

हुसैनवाला से शिवपुरी तक 129 किलोमीटर लंबी ये उस वक़्त दुनियाँ की सबसे लंबी नहर थी...

गंगनहर के निर्माण में उस वक़्त कुल 8 करोड़ रुपये खर्च हुए...

गंगनहर से वर्तमान में 30 लाख हेक्टेयर भूमि की सिंचाई होती है...

इतना ही नहीं...
वर्ष 1922 में महाराजा गंगासिंह जी ने बीकानेर में हाई-कोर्ट की स्थापना की...
इस उच्च-न्यायालय में 1 मुख्य न्यायाधीश के अलावा 2 अन्य न्यायाधीशों की नियुक्ति भी की...

इस प्रकार बीकानेर देश में हाई-कोर्ट की स्थापना करने वाली प्रथम रियासत बनी...

वर्ष 1913 में महाराजा गंगासिंह जी ने चुनी हुई जनप्रतिनिधि सभा का गठन किया...

महाराजा गंगासिंह जी ने बीकानेर रियासत के कर्मचारियों के लिए एंडोमेंट एश्योरेंस स्कीम व जीवन बीमा योजना लागू की...

महाराजा गंगासिंह जी ने निजी बैंकों की सुविधाएं आम नागरिकों को भी मुहैय्या करवाई...

महाराजा गंगासिंह जी ने बाल-विवाह रोकने के लिए शारदा एक्ट कड़ाई से लागू किया....

महाराजा गंगासिंह जी ने बीकानेर शहर के परकोटे के बाहर गंगाशहर नगर की स्थापना की....

बीकानेर रियासत की इष्टदेवी माँ करणी में गंगासिंह जी की अपने पूर्व शासकों की भाँति अपार आस्था थी...
इन्होंने देशनोक धाम में माँ करणी के मंदिर का जीर्णोद्धार भी करवाया...

महाराजा गंगासिंह जी की सेना में गंगा-रिसाला नाम से ऊँटों का बेड़ा भी था...
इसी गंगा-रिसाला ऊँटों के बेड़े के साथ महाराजा गंगासिंह जी ने प्रथम व द्वितीय विश्वयुद्ध में अदम्य साहस शौर्य वीरता से युद्ध लड़े...
इन्हें ब्रिटिश हुकूमत द्वारा उस वक़्त सर्वोच्च सैन्य-सम्मान से भी नवाजा गया...

गंगासिंह जी के ऊँटों का बेड़ा गंगा-रिसाला आज सीमा सुरक्षा बल (बीएसएफ) की शान है.... व देश सेवा में गंगा-रिसाला हर वक़्त मुस्तैद है....

(बीकानेर महाराजा करणीसिंह... निशानेबाजी में भारत के प्रथम अर्जुन पुरस्कार विजेता)...

(वर्तमान में करणीसिंह जी की पौत्री व बीकानेर राजकुमारी सिद्धि कुमारी जी (सिद्धि बाईसा) बीकानेर से भाजपा विधायक है)....

कहते हैं माँ गंगा को धरती पे राजा भागीरथ लाये थे इसलिए गंगा नदी को भागीरथी भी कहा जाता है...

21 वर्षों के लंबे संघर्ष और कानूनी लड़ाई के बाद महाराजा गंगासिंह जी ने अकाल से जूझती बीकानेर/राजस्थान की जनता के लिए गंगनहर के रूप रेगिस्तान में जल गंगा बहा दी थी...

गंगनहर को रेगिस्तान की भागीरथी कहा जाता है...

इसलिए...
महाराजा गंगासिंह जी को मैं कलयुग का भागीरथ कहूँ तो इसमें अतिशयोक्ति नहीं होगी!!!!....

चित्र- गंगा नहर परियोजना की खुदाई के दुर्लभ चित्र उस समय ऊँटगाड़ो की सहायता से नहर खुदाई का कार्य सम्पन्न हुआ था। नमन है उन कामगारों को जिनकी मदद से आज वीरान राजस्थान हरा भरा हुआ है


Tuesday, July 27, 2021

सहजन (Drumstick) के बारे में रोचक तथ्य कौन-से हैं?सहजन के रोचक तथ्य इस प्रकार हैं


1. सहजन को जादू का पेड़ कहा जाता है। इसका हर भाग जैसे जड़, डालीं, पत्ते, फूल, फल आदि सभी को खाया जाता है।
2. सहजन की एक टहिनी भी गाड़ दी जाए तो इसका पेड़ लग जाता है। इसका वृक्ष किसी भी भूमि पर पनप सकता है।

3. सहजन को कई नामों से जाना जाता है, जैसे कि सहजना, सुजना, सेंजन, मुनगा, मुंगना, मेनणा, मोरिंगा, ड्रम्स्टिक आदि।

4. इसकी 100 ग्राम पतियों में 6800 मिलीग्राम कोरोटीन होता है, जिसे हमारा शरीर विटामिन 'ए' में बदल देता है।

5. सहजन में विटामिन 'ए' गाजर से 4 गुणा अधिक पाया जाता है।

6. सहजन की 100 ग्राम पत्तियों में 5 गिलास दूध के बराबर कैल्शियम होता है।

7. सहजन में प्रोटीन दही की तुलना में तीन गुणा अधिक पाया जाता है।

8. सहजन में 45 तरह के एंटी-ऑक्सीडेंट्स और 90 तरह के मल्टी-विटामिनस गुण पाए जाते हैं।

9. Drumstick की सब्जी और इसके आचार में कई ऐसे औषधीय गुण पाए जाते हैं, जिससे बहुत बीमारियों से छुटकारा पाया सकता है।
10. यह भी माना जाता है कि अगर सहजन के पेड़ के सभी भागों को काम में लाया जाए तो यह 300 से अधिक बीमारियों को दूर कर सकता है।

11. कुछ इतिहासकारों के अनुसार सिकंदर की सेना को हराने के लिए प्रसिद्ध मौर्य सेना के प्रमुख, सप्लीमेंट के रूप में मोंरिगा का सेवन किया करते थे।

Thursday, July 22, 2021

बुरिदान(buridan's) का गधा

बुरिदान(buridan's) का गधा एक दार्शनिक शब्द या विडंबना है, जो एक काल्पनिक स्थिति को संदर्भित करता है जहां एक भूखे और प्यासे गधे को घास और पानी की बाल्टी के बीच रखा जाता है। चूंकि यह माना जाता है कि उसकी भूख उसकी प्यास के बराबर है इसलिए गधा खाने और पीने के बीच झिझकता रहता है, और वह उनमें से किसी एक को चुनने की स्थिति में नहीं पहुंच पाता है। नतीजा यह है कि बुरिदान का गधा मर जाएगा क्योंकि उसके इरादे समान हैं और उसकी पसंद वह घास और पानी के बीच कोई तर्कसंगत निर्णय नहीं ले पाएगा।

निष्कर्ष: निर्णय लेने में झिझक कर अपना जीवन बर्बाद न करें...

Saturday, March 20, 2021

गिलोय- कई भयानक बीमारियों का इकलौता इलाज है गिलोय, जानें क्या हैं इसके फायदे

बाजारों में गिलोय कई रूप में उपलब्ध है. गिलोय का जूस और गिलोय की गोलियों से भी हम अपनी इम्यूनिटी बढ़ा सकते हैं. इसके अलावा गिलोय का काढ़ा बनाकर भी सेवन किया जा सकता है.


कई भयानक बीमारियों का इकलौता इलाज है गिलोय, जानें क्या हैं इसके फायदे
  • कई खतरनाक बीमारियों का रामबाण इलाज है गिलोय
  • जूस, गोली और काढ़ें के रूप में कर सकते हैं गिलोय का सेवन

गिलोय एक काफी साधारण पौधा है, जो हमारे आसपास काफी आसानी से मिल जाता है. गिलोय एक तरह की बेल होती है, जिसमें पान की तरह दिखने वाले पत्ते लगे होते हैं. गिलोय कई प्रकार के औषधीय गुणों से भरपूर है, जो कई तरह के रोगों में चमत्कारी लाभ पहुंचाता है. हालांकि, इसके कुछ नुकसान भी हैं. इसलिए गिलोय का सेवन करने का सही तरीका मालूम होना बहुत जरूरी है. आज हम आपको गिलोय के कुछ जबरदस्त फायदे बताने जा रहे हैं, जो आपकी कई समस्याओं को दूर कर सकता है.

कोरोना वायरस के इस दौर में गिलोय की मांग काफी बढ़ गई है. वैज्ञानिकों के मुताबिक मजबूत इम्यूनिटी से कोरोना वायरस को मात दी जा सकती है और गिलोय इम्यूनिटी बढ़ाने की एक प्रभावशाली औषधि है. लिहाजा, कोरोना काल में इम्यूनिटी बढ़ाने के लिए गिलोय की मांग काफी बढ़ गई है. बाजारों में गिलोय कई रूप में उपलब्ध है. गिलोय का जूस और गिलोय की गोलियों से भी हम अपनी इम्यूनिटी बढ़ा सकते हैं. इसके अलावा गिलोय का काढ़ा बनाकर भी सेवन किया जा सकता है.

आंखों के लिए
गिलोय का इस्तेमाल कर आंखों से जुड़ी कई परेशानियों से मुक्ति पाई जा सकती है. 10 एमएल गिलोय के रस में एक ग्राम शहद और एक ग्राम सेंधा नमक अच्छी तरह से मिला लें. अब इसे काजल की तरह आंखों में लगाएं. ऐसा करने से आंखों से जुड़ी कई दिक्कतें दूर होती हैं. ये आंखों की चुभन, मोतियाबिंद और अंधेरा छाने जैसी परेशानियों में जबरदस्त लाभ पहुंचाता है.

कानों के लिए
गिलोय को अच्छी तरह से कूटकर पानी में गरम कर लें. अब इसकी दो-दो बूंद दिन में दो बार अपने कानों में डालें. यह कान की सफाई में काफी मदद करता है.

इन सभी के अलावा गिलोय का इस्तेमाल हिचकी, टीबी, उल्टी, कब्ज, बवासीर, पीलिया, लीवर, डायबिटीज, गठिया, फाइलेरिया, कुष्ठ रोग, बुखार, एसिडिटी, कफ, कैंसर जैसी भयानक बीमारियों में भी काफी फायदेमंद होता है.

प्रत्येक परेंट्स के लिए जरूरी जानकारी - गूगल यूट्यूब व सर्च इंजन पर पाबंदी मोड बंद या चालू करना

यूट्यूब में सेटिंग में जाना है,
वह जनरल में restricted Mode ऑन करना है.
पाबंदी मोड, विकल्प के तौर पर दी गई सेटिंग है. इसका इस्तेमाल करके, आप ऐसे वीडियो पर रोक लगा सकते हैं जो शायद वयस्कों के लिए बना हो. ऐसे वीडियो को शायद आप देखना नहीं करेंगे या नहीं चाहेंगे कि डिवाइस का इस्तेमाल कर रहे दूसरे लोगों को यह दिखे.
Android कंप्यूटरiPhone और iPad
पाबंदी मोड चालू 
Android ऐप्लिकेशन
मोबाइल साइट
Android TV
पाबंदी मोड को बंद करने में आने वाली समस्याएं
ऐसा हो सकता है कि लाइब्रेरी, विश्वविद्यालयों, और दूसरे सार्वजनिक संस्थानों में लगे कंप्यूटरों पर सिस्टम एडमिन ने पाबंदी मोड चालू किया हो. अगर आप किसी सार्वजनिक कंप्यूटर का इस्तेमाल कर रहे हैं और पाबंदी मोड को बंद नहीं कर पा रहे हैं, तो अपने सिस्टम एडमिन से संपर्क करें.

अपने परिवार के लिए पाबंदी मोड नियंत्रित करना
अगर आप अभिभावक हैं और Family Link ऐप्लिकेशन का इस्तेमाल करते हैं, तो ऐप्लिकेशन की सेटिंग में अपने बच्चे के खाते के लिए पाबंदी मोड को चालू कर सकते हैं. अगर आपने Family Link ऐप्लिकेशन की मदद से, अपने बच्चे के खाते के लिए पाबंदी मोड चालू किया है, तो वह इस मोड की सेटिंग में कोई बदलाव नहीं कर पाएगा. यह कार्रवाई उन सभी डिवाइस पर लागू होगी जिनमें आपके बच्चे के खाते से साइन इन किया गया है.

पाबंदी मोड के बारे में ज़्यादा जानकारी
हम ऐसी सामग्री की पहचान करने और उसे फ़िल्टर करने के लिए कई संकेतों का इस्तेमाल करते हैं जो शायद वयस्क लोगों के लिए हो. इन संकेतों में शामिल हैं: वीडियो के शीर्षक, जानकारी, मेटाडेटा, ग्रुप दिशा-निर्देश, और उम्र से जुड़ी पाबंदी. पाबंदी मोड सभी भाषाओं में उपलब्ध है, लेकिन लोगों की संस्कृति और वयस्क सामग्री के बारे में उनकी सोच अलग-अलग होने के कारण क्वालिटी के पैमाने अलग-अलग हो सकते हैं. पाबंदी मोड चालू होने पर, आप देखे जाने वाले वीडियो पर की गई टिप्पणियों को नहीं देख पाएंगे.

पाबंदी मोड, ब्राउज़र या डिवाइस के लेवल पर काम करता है. इसलिए, आप हर उस ब्राउज़र की सेटिंग में जाकर इस मोड को चालू करें जिसका आप इस्तेमाल करते हैं. अगर आप ब्राउज़र पर एक से ज़्यादा प्रोफ़ाइल इस्तेमाल करते हैं, तो इसे हर प्रोफ़ाइल के लिए चालू करना होगा.

 

Monday, March 15, 2021

किताब- इन 5 कारणों से जरूरी होता है किताबें पढ़ना-

हमारी ज़िन्दगी हमारे व्यक्तित्व का आइना होती है और वो हमारे द्वारा ही डिजाइन की जाती है. हमारी ज़िंदगी में मिलने वाले विकल्प हम खुद ही चुनते हैं. हर एक क्षण हर एक परिस्थिति हमको एक नया विकल्प देती है. हम चाहे खुशियाँ चुने या दुःख, निश्चितता या अनिश्चितता, सफलता या असफलता, साहस या डर आदि. हमारे पास हमेशा ये अवसर होता है कि हम चीजों को अलग तरीके से करें और अपने लिए सकारात्मक परिणाम खोजे. ऐसा होना तभी संभव है जब हम अपनी सकारात्मक सोच के लिए किताबों का सहारा लें.किताबें पढ़ने से होता है
अच्छी आदतों का विकास :किताबों को पढ़ना सबसे बुनियादी आदतों में से एक है जिसमें किसी बच्चे से लेकर जवान और बुढ्ढे जीवन में सफल होना सीख सकते है. अच्छी किताबें पढ़ने से ना केवल अच्छी आदतों का विकास होता है बल्कि स्वाभाविक रूप से हमारे बच्चे के भविष्य के लिए महत्वपूर्ण है. रोजमर्रा की जिंदगी में भी जवान और बुढ्ढे लोग इनको पढ़ सकते है. हमको पढ़ने की आदतों को विकसित करना चाहिए क्यूंकि किताबें पढ़ना महत्वपूर्ण होता है.
दिमाग की अच्छी कसरत करती है किताब :- हमारे मस्तिष्क के लिए एक अच्छी किताब पढ़ने से बेहतर कोई कसरत नहीं हो सकती है. समाज में हर तरह के लोग है और हर तरह की किताबें बाजार में उपलब्ध है.हर इंसान अपनी रूचि के हिसाब से किताब पढ़ता है. व्यापारी लोग ज्यादातर व्यापार से संबंधित पुस्तकों को पढ़ते है, युवा लोग प्यार, रिश्तों आदि की किताबों को पढ़ते हैं, वृद्ध लोग धर्मिक किताबें पढ़ना पसंद करते है. पुस्तकें पढ़कर आप मनोरंजन के साथ-साथ ज्ञान भी अर्जित करते है. हर इंसान एक अच्छी किताब का आनंद लेना चाहता है.
शब्दावली का विकास :किताबें पढ़ने से आप अपनी शब्दावली को विकसित कर सकते है. जितना अधिक आप पढ़ते हैं उतने ही नये शब्द आपकी शब्दावली में अपना रास्ता खोज लेते है. पढ़ना उन शब्दों और वाक्यांशों को सीखा देता है जिन्हें आप सामान्य भाषण के भाग के रूप में उपयोग कर सकते हैं.ध्यान लगाने में मदद : किताबें पढ़ने से आप किसी भी बात में ध्यान लगाने की अवधि को बढ़ाते हैं. प्रारंभिक उम्र से अच्छी पढ़ी जाने वाली किताबों की आदतों को अपने आप में प्रोत्साहित करने से ध्यान अवधि बढ़ती है और हमें बेहतर और अधिक समय तक ध्यान केंद्रित करने में आसानी होती है समय का सही उपयोग अच्छी किताबों को पढ़ने की आदतें समय का सही उपयोग करवाती है. जब कभी हम खाली बैठे होते है तो हम सोचते रह जाते है कि हम क्या करें और क्या न करें. उस समय किताबों को पढ़ने से हमारा समय का सदुपयोग हो जाता है.
पुस्तकों के लिए आजीवन प्रेम :किताबें पढ़ने की आदतों को विकसित करने से हम अपने अंदर पुस्तकों के किये आजीवन प्रेम विकसित कर लेते है. नियमित रूप से पढ़ना शुरू करने पर हम आगे जीवन में किताबें पढ़ने का आनंद लेने लगते हैं
होती है ज्ञान की प्यास विकसित :किताबें पढ़ने से हमारे अंदर ज्ञान की प्यास को प्रोत्साहित मिलता है. अच्छी किताबे पढ़ने की आदत से हम हमारे चारों ओर की दुनिया के बारे में अधिक जानते है. अन्य संस्कृतियों में रुचि विकसित करते है.

Sunday, March 14, 2021

योग व प्राणायम

योग मूल रूप से एक आध्यात्मिक अनुशासन है जो एक अत्यंत सूक्ष्म विज्ञान पर आधारित है जो मन और शरीर के बीच सद्भाव लाने पर ध्यान केंद्रित करता है। यह एक जैविक, सम्पूर्ण और स्वस्थ जीवन जीने की कला है। शब्द योग संस्कृत के शब्द 'युज’ से बना है। जिसका मतलब है जोड़ना।
योग और आयुर्वेद दोनों ऐतिहासिक रूप से संबंधित हैं और प्राचीन काल से एक दूसरे के साथ मिलकर विकसित हुए हैं। योगिक पवित्र लेखन के अनुसार योग का कार्य सार्वभौमिक चेतना के साथ व्यक्तिगत चेतना के मिलन का संकेत देता है, जो मन और शरीर, मनुष्य और प्रकृति के बीच एक आदर्श अनुरूपता दर्शाता है।
माना जाता है कि योग तीन दोषों को संतुलित करता है , कफ, पित्त, वात।

वर्तमान में समकालीन परिस्थितियों में, सभी को स्वास्थ्य के संरक्षण, रखरखाव और संवर्धन के प्रति योग प्रथाओं के बारे में दृढ़ विश्वास है। स्वामी शिवानंद, श्री टी.कृष्णाचार्य, स्वामी कुवलयानंद, श्री योगेन्द्र, स्वामी राम, श्री अरबिंदो, महर्षि महेश योगी, आचार्य राजनिष, पट्टाभिजोइस, बीकेएस अयंगर, स्वामी सत्यानंद सरस्वती जैसी अविश्वसनीय हस्तियों के शोध और प्रचार से योग दुनिया भर में फैल गया है।
वैसे तो योग सीखने में कई चक्र और आसनों को सीखना पड़ता है। 

आसान शब्दों में योग एक जीवनशैली है।

जिसके अन्तर्गत व्यक्ति को शारीरिक, मानसिक और आध्यत्मिक क्रियाओं और प्रथाओं द्वारा एक बेहतर जीवन की रूपरेखा बताई गई है।

कई जगह योग का प्रारंभ सिंधु घाटी सभ्यता के दौरान कहा गया है। किन्तु इसके उदयन का काल निश्चित तौर पर नहीं कहा जा सकता। अधिकतर वैदिक काल के दौरान ही इसके होने के सबूत हैं, १३०० से ३०० ईसा पूर्व।

योग का मुख्य उद्देश्य है मोक्ष।

मोक्ष उस हर विचार, आचरण, आहार, कर्म, क्रिया और जीवनशैली से जो दुख से जुड़ी है।
तीन प्रकार के योग।

कर्म योग,
कर्म और किया से जुड़ा योग।
भक्ति योग,
इसका मुख्य उद्देश्य है ईश्वर की प्राप्ति अथवा भक्ति की प्राप्ति।
ज्ञान योग,
ज्ञान को पाने का उद्देश्य।

किन्तु हठ योग के निम्न बारह आसन अहम हैं।

  • शीर्षासन।
  • सर्वांगासन।
  • हल आसन।
  • मत्स्यासन।
  • पश्चिमोतनासन।
  • भुजंगासन।
  • शलभासन।
  • धनुषासन।
  • अर्ध मत्स्येंद्र आसन।
  • मयूरासन।
  • पदा हस्तासना।
  • त्रिकोणासन।

लाभ,

  1. लचीलापन बढ़ना।
  2. मांसपेशियों की शक्ति बढ़ाने और चोट से उबरने में सहायक।
  3. श्वसन, ऊर्जा और जीवन शक्ति में सुधार।
  4. संतुलित आहार पचन बनाए रखना।
  5. वज़न घटाना।
  6. कार्डियो और संचार स्वास्थ्य बेहतर होना।
  7. एथलेटिक प्रदर्शन में सुधार।
  8. चोट से सुरक्षा।
  9. शरीर में रक्त दाब बेहतर होता है। 
  10. इसके अलावा मानसिक तनाव से जूझने में बेहद कारगर।

प्राणायम!

योगासन से जुड़ी श्वास प्रक्रिया को प्राणायाम कहा जाता है। प्राण+ आयाम( श्वास+निलंबन)

तीन चरणों में इसे पूरा किया जाता है: पूरक(श्वास अंदर लेना), कुंभक (पकड़े रखना), रिचक ( श्वास छोड़ना)

योग करते वक्त श्वास को किस प्रकार लेना है तथा उसे कितने समय तक पकड़ कर रखना है और किस वक्त छोड़ना है, ये पूरी प्रक्रिया प्राणायम है।

इसे योग करते वक्त, योगासन के साथ साथ अथवा योग के अलावा स्थिर आसन में केवल श्वास नियंत्रण के तौर पर की जा सकती है।

आसान शब्दों में प्राणायम, श्वास के लेने और छोड़ने के बीच के अंतराल को खींचने की प्रक्रिया है।

प्राणायम १२ प्रकार के होते हैं।

नाड़ी शोधन

अपने अंगूठे के साथ, अपने दाहिने नथुने पर नीचे दबाए, अपने बाएं नथुने का उपयोग गहरी साँस लेने के लिए करें।

एक बीट के लिए अपनी सांस पकड़े और फिर अपने अंगूठे को स्विच करें ताकि आप अब अपने बाएं नथुने पर दबा रहे हों, और फिर अपने दाहिने नथुने से साँस छोड़ें ।

इस प्रक्रिया को दोहराएं, एक के माध्यम से श्वास और दूसरे के माध्यम से साँस छोड़ते हुए अपने नथुने के बीच बारी-बारी से। आप इसे 10-15 बार दोहरा सकते हैं।

शिताली प्राणायम
यह विशेष प्राणायाम शरीर को ठंडा करने के लिए प्रभावी है। आप बैठने की स्थिति में शुरू करते हैं और पांच से छह गहरी साँस लेकर प्राणायाम के लिए अपने शरीर को तैयार करते हैं।

फिर अपने मुंह से एक 'ओ' आकार बनाएं और गहराई से साँस लेना शुरू करें। हमेशा अपनी नाक के माध्यम से साँस छोड़ते जाए। इसे 5-10 बार दोहराया जा सकता है।


उज्जई प्राणायम
यह प्राणायाम समुद्र की लहरों की आवाज़ की नकल करने के बारे में है। यह प्रदर्शन करने में थोड़ा अजीब लग सकता है, लेकिन यह विश्राम में काफी मदद करेगा।

आप एक जगह बैठे, क्रॉस-लेग स्थिति में और अपने मुंह से सांस लेना शुरू करें। जब आप साँस लेते हैं और साँस छोड़ते हैं, तो कोशिश करें कि, अपने गले को एक तरह से संकुचित करें कि आपको घुंटन का अनुभव हो। परिणाम एक ध्वनि होगी जो समुद्र की लहरों के समान है।

प्राणायाम के दूसरे चरण में, आप अपना मुंह बंद करते हैं और अपनी नाक से सांस लेते रहें। हालांकि, आपको अपने गले पर एक ही कसाव का उपयोग करना जारी रखना चाहिए। आप इसे 10-15 बार में दोहरा सकते हैं।
कपालभाति प्राणायम
यह प्राणायाम एक जगह बैठी स्थिति में शुरू होता है, जब आप सामान्य रूप से 2-3 बार सांस लेते हैं। इसके बाद, आपको गहराई से साँस लेना चाहिए और बल के साथ साँस छोड़ना चाहिए, अपने पेट को अंदर की तरफ खाली करते हुए आप सारी हवा को निष्कासित करते हैं। जब आप फिर से सांस लेते हैं, तो आपका पेट वापस उसी स्थिति में चला जाना चाहिए।

आपको इसे 20-30 बार दोहराना चाहिए।
दीर्घा प्राणायम
यह एक प्राणायाम है जिसे बैठने के स्थान पर लेट कर किया जाता है। आप अपने पेट को भरते हुए, बहुत सारी हवा लेते हैं, ताकि वह ऊपर उठे। आप कुछ सेकंड के लिए इस स्थिति में रहें और फिर सांस छोड़ें, अपने पेट को अंदर की तरफ खींचे जब तक की सांस पूरी तरह से बाहर नहीं निकल जाती।

प्राणायाम के दूसरे भाग में, आप और भी अधिक गहराई से साँस लेते हैं, इसलिए आप अपने पसली के पिंजरे को हवा से भी भर दें। फिर साँस छोड़ना। तीसरी बार जब आप साँस लेते हैं, तो आपको और भी गहरी साँस लेनी है । अपने पेट, रिब पिंजरे, और दिल के केंद्र को सांस से भरने की कल्पना करें। धीरे-धीरे सांस छोड़ें।

आप इस प्रक्रिया को 5-6 बार दोहरा सकते हैं।

विलोम प्राणायम
इस प्राणायाम को दो भागों में विभाजित किया जा सकता है;

  • रोक कर साँस लेना,आप एक आरामदायक स्थिति में लेट कर शुरू करें और सामान्य रूप से सांस लेते रहें। आराम से सांस लेते हुए आप 2-3 सेकंड के लिए सांस लेकर रुक जाए। दो सेकंड के लिए अपनी सांस पकड़े और फिर से साँस लेना शुरू करें।
  • 2 सेकंड के लिए सांस रोकें और फिर धीरे-धीरे फिर से शुरू करें। जब तक आपके फेफड़े हवा से भरे न गया हों तब तक अंतराल में साँस लेना जारी रखें। धीरे-धीरे सांस छोड़ें जब तक कि आपने सारी हवा को बाहर नहीं निकाल दिया।

अनुलोम प्राणायम
यह विलोम प्राणायाम के समान है क्योंकि यह वैकल्पिक नथुने की श्वास को भी प्रोत्साहित करता है। साँस लेना और साँस छोड़ना एक नथुने के साथ किया जाता है लेकिन दूसरा नथुना आंशिक रूप से खुला होता है क्योंकि पूरी तरह से अवरुद्ध होता है।

भ्रमरी प्राणायम
प्राणायाम में आपकी आंखें और कान बंद हो जाएंगे। आप अपने कानों को अपने अंगूठे से बंद करें और अपनी उंगलियों की मदद से अपनी आँखें बंद करें। ओम का जाप करते हुए गहरी सांस लें और छोड़ें। 10-15 बार दोहराएं।

भस्त्रिका प्राणायम
यह सर्दियों के महीनों के लिए फायदेमंद है जब आपको शरीर में गर्मी बनाए रखने की आवश्यकता होती है। आप एक जगह बैठे, क्रॉस-लेग्ड स्थिति में शुरू करते हैं और लगातार बहुत तेज गति से साँस लेना और छोड़ना शुरू करते हैं। आपकी सांस को लगातार चलते रहना मुश्किल हो सकता है लेकिन लगातार रहने की पूरी कोशिश करें।

कुछ राउंड्स के बाद, अपनी सांस को अंत में पकड़ें और धीरे-धीरे सांस छोड़ें।

शीतली प्राणायम
आप अपने मुंह से साँस लेना शुरू करें। हालांकि, आपको अपनी जीभ को गोल घुमाकर के रखना होगा। अपनी ठुड्डी को आगे की ओर झुकाएं और थोड़ी देर के लिए अपनी सांस रोकें। फिर अपने नथुने से साँस छोड़ें। यह गर्म महीनों के लिए एक महान प्राणायाम है क्योंकि यह आपके शरीर को ठंडा रखता है।
मूर्छा प्राणायम
यह एक कठिन प्राणायाम है जिसमें बिना साँस के लिए, लगातार साँस छोड़ना शामिल है। यह आपके शरीर में कार्बन डाइऑक्साइड की एकाग्रता को बढ़ाता है और एक बिंदु के बाद आपको बेहोश कर देता है। आप धीरे-धीरे चेतना वापस पा लेते हैं जब आपका शरीर स्वचालित रूप से आपकी नींद में प्रवेश करना शुरू कर देता है।

पलवनी प्राणायम
यह पानी में किया जाता है और केवल अधिक अनुभवी योगियों के लिए सलाह दी जाती है। इसमें आपकी सांस के साथ काम करना शामिल है जो आपको पानी में तैरते हुए करनी होती है।

मुझे तो एसिडिटी में भी प्राणायम मात्र करने से फायदा पहुंचा है।

Saturday, March 13, 2021

भारतीय पाइप - मोनोट्रोपा यूनिफ्लोरा (Ghost plant)

चित्र गूगल

भारतीय पाइप - यह आकर्षक पौधा (मोनोट्रोपा यूनिफ्लोरा) निश्चित रूप से प्रकृति के अजीब आश्चर्यों में से एक है। क्योंकि इसमें कोई क्लोरोफिल नहीं है और यह प्रकाश संश्लेषण पर निर्भर नहीं करता है, यह भूतिया सफेद पौधे जंगलों के सबसे अंधेरे में बढ़ने में सक्षम है। कई लोग इस अजीब पौधे को भारतीय पाइप कवक के रूप में संदर्भित करते हैं, लेकिन यह कवक नहीं है - यह सिर्फ एक जैसा दिखता है। यह वास्तव में एक फूल वाला पौधा है, और इसे मानो या न मानो, यह ब्लूबेरी परिवार का एक सदस्य है। 

Friday, March 12, 2021

गाजर और चुकंदर का जूस

 इसे कुछ ही समय में घर पर तैयार कर सकते हैं। में बात कर रहा हूँ गाजर और चुकंदर के जूस की।

गाजर और चुकंदर का जूस बनाने में यह सब चीजें चाहिए होगी।

आधा चुकंदर

एक गाजर

आंवला

आधा नींबू

थोड़ा काला नमक और पुदीना पत्ती

सबसे पहले चुकंदर और गाजर को अच्छी तरह धोकर, छोटे छोटे टुकड़ों में काट लें और जूसर में डाल दें उसके बाद आंवला और पुदीने की पत्तियों को भी धोकर जूसर में डाल दें। अब जूसर में थोड़ा पानी डालकर इन सब का जूस निकाल लें।

जूस निकलने के बाद इसमें काला नमक और नींबू का रस मिक्स करें और इस जूस का आनंद लें।

इस जूस को पीने के लाभ: -

  1. आपको दिनभर तरोताज रखेगा।
  2. इसे पीने से आंखों की रोशनी बढ़ेगी।
  3. त्वचा में निखार बढेगा और चहरे पर लालिमा आएगी।
  4. शरीर में खून की कमी नहीं होगी।
  5. खून से विषैले तत्व बाहर निकलेंगे।
  6. शरीर की ऊर्जा और स्टैमिना बढेगा।
  7. बालों का झड़ना बंद होगा।
  8. पेट की परेशानियां दूर होंगी।
  9. रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ेगी।
  10. दिल से जुड़ी बीमारियां नहीं होंगी।

Thursday, March 11, 2021

आपका फोन हैक होने पर कैसे पता करें और कैसे ठीक करें?

जब आपका फोन हैक हो जाएगा तो आपके फोन का व्यवहार बदल जाएगा, आपका स्मार्टफोन कहीं ना कहीं अजीब सी हरकतें करने लगेगा जैसे कि किसी एप्स का फोन को बंद करने पर भी अचानक से खुल जाना और मोबाइल में data का अधिक यूज़ ना करने पर भी data की खपत ज्यादा हो जाना इत्यादि |

नोटिफिकेशन में भी पॉपअप विज्ञापन की संख्या बहुत ज्यादा मात्रा में पड़ जाती है यहां तक की जब आप इंटरनेट सर्फिंग करते हैं तो उस समय भी इतना ज्यादा विज्ञापन दिखाई देगा की आप सही ढंग से इंटरनेट ब्राउजिंग भी नहीं कर सकते , यह सभी विज्ञापन आपको नए-नए आप इंस्टॉल करने की सलाह देंगे ।

हैक फोन में अपने आप ही कुछ फाइलें या फिर एप्स डाउनलोड होने लगते हैं जिन्हें आप कैंसिल नहीं कर सकते अगर आप कैंसिल करते हैं या रोक देते हो तो यह फिर से डाउनलोड होने लगते हैं।

अगर आपके स्मार्टफोन में इस प्रकार की समस्याएं हैं तो निश्चित तौर पर आपका फोन हैक हैं

तो सबसे पहले एप्स ऑप्शन पर जाकर ऐप्स को चेक करें की कोई अंजाना apps आपके मोबाइल में इंस्टॉल तो नहीं अगर है तो उसे uninstalled कर दें

नोट-

लगभग में ( 60%-80%) जो भी फोन हैक होते हैं वह किसी एप्स के माध्यम से किए जाते हैं तो अगर ऐसा आपके साथ है तो सबसे पहले गूगल प्ले स्टोर पर जाएं

और वहां पर मैन्यू पर क्लिक करें फिर गूगल प्ले प्रोटेक्ट ऑप्शन के उपर क्लिक करें और उसे स्कैन कर दे अगर आपके फोन में कोई बेकार या फिर स्पाई एप इंस्टॉल तो वह उसे स्कैन करके आपको बता देगा

और आपको गूगल की सिक्योरिटी पर तो भरोसा होगा ही

फिर आप हो उस ऐप को uninstall कर दें कुछ केस में ( 10%-20%) गूगल प्ले प्रोटेक्ट से भी स्कैन करने पर वह apps /मालवेयर डिटेक्ट नहीं होते हैं

अब आप सोचोगे तब क्या करें तो भाई मैं उसके लिए भी हूं ना

इस सवाल का एक ही जवाब है सबसे सीधा और सबसे आसान आपके मोबाइल फोन जो भी इंपॉर्टेंट डाटा है उसे कहीं पर स्टोर करें इसके बाद अपने फोन के सेटिंग में जाकर फोन को रिसेट कर दे या फिर अपने फोन को अगर आपको हार्ड रिसेट करने आता है तो हार्ड रिसेट कर दें जिससे कोई भी मालवेयर या फिर एप्लीकेशन आपकी मोबाइल फोन पर कंट्रोल कर रहा होगा तो वह सब कुछ डिलीट हो जाएगा

आशा है यह पोस्ट आपकी काफी मदद करेगा और आपको पसंद भी आया होगा अगर पसंद आया हो तो पसन्द शेयर जरूर करें। 

Wednesday, March 10, 2021

श्री सनकादि मुनि जी

श्री सनकादि मुनि कौन हैं, उनके श्राप से हिरण्यकशिपु, हिरण्याक्ष, रावण, कुम्भकर्ण और शिशुपाल आदि जैसे राक्षस कैसे पैदा हुएजगतपिता परमेश्वर के अध्यक्षता में प्रकृति द्वारा रची गयी सृष्टि के प्रारम्भ में लोकपितामह ब्रह्मा ने विविध लोकों को रचने की इच्छा से तपस्या (उद्योग) की। लोकस्रष्टा के उस अखण्ड तप से प्रसन्न होकर विश्वाधार परमप्रभु ने ‘तप’ अर्थवाले ‘सन’ नाम से युक्त होकर सनक, सनन्दन, सनातन और सनत्कुमार-इन चार निविृत्ति परायण ऊध्र्वरेता मुनियों के रूप में (ब्रह्मा जी के मानस पुत्र के रूप में) अवतार ग्रहण किया।

ये चारो ब्रह्मर्षि अपने प्राकट्य-काल से ही मोक्षमार्ग-परायण, ध्यान में तल्लीन रहने वाले, नित्यसिद्ध एवं नित्य विरक्त थे। लेकिन इन नित्य ब्रह्माचारियों से भी ब्रह्माजी के सृष्टि-विस्तार की आशा पूरी नहीं हो सकी। देवताओं के पूर्वज और लोकस्रष्टा ब्रह्मा जी के आदि मानसपुत्र सनकादि मुनियों के मन में कहीं किंचित् मात्र आसक्ति नहीं थी। वे प्रायः आकाश मार्ग से विचरण किया करते थे।

एक बार उन दिव्य मुनियों के मन में बैकुण्ठ लोक में साक्षात विराजित भगवान् के दर्शन की लालसा उत्पन्न हुई । वे उसी इच्छा से श्रीभगवान् के श्रेष्ठ वैकुण्ठ धाम में पहुँचे। वहाँ, बैकुण्ठ लोक में, सभी शुद्ध-सत्त्वमय चतुर्भुज के समान श्रेष्ठ रहते हैं।

सनकादि मुनिगण भगवददर्शन की लालसा से वैकुण्ठ की दुर्लभ, दिव्य दर्शनीय वस्तुओं की उपेक्षा करते हुए छठी ड्योढ़ी (Sixth Dimension) के आगे बढ़ ही रहे थे कि भगवान् के पार्षद जय और विजय ने उन पांच वर्ष के बालक जैसे दीखने वाले दिगम्बर तेजस्वी कुमारों की हँसी उड़ाते हुए तथा अपनी शक्ति का प्रयोग करते हुए उन्हें आगे बढ़ने से रोक दिया।

भगवददर्शन में व्यवधान उत्पन्न होने के कारण सनकादि मुनियों को क्रोध आ गया। उन श्रेष्ठ मुनियों ने उन्हें (पार्षद जय और विजय को) दैत्यकुल में जन्म लेने का शाप दे दिया। अपने प्राणप्रिय एवं अपने से अभिन्न सनकादि कुमारों के अनादर का संवाद मिलते ही वैकुण्ठनाथ श्रीहरि तत्काल वहाँ उपस्थित हो गये।

उस समय भगवान् की अदभुत, अलौकिक एवं दिव्य सौन्दर्यराशि के दर्शन कर सर्वथा विरक्त सनकादि कुमार भी स्तब्ध हो गये। सब कुछ थम गया था। वे चारो अपलक नेत्रों से प्रभु की ओर देखने लगे। उनके हृदय में आनन्द का महासागर उमड़-घुमड़ रहा था।

उन्होंने वनमालाधारी लक्ष्मीपति भगवान् श्रीविष्णु की स्तुति करते हुए उन्होंने कहा-‘विपुलकीर्ति प्रभो! आपने हमारे सामने जो यह मनोहर रूप प्रकट किया है, उससे हमारे नत्रों को बड़ा ही सुख मिला है; विषयासक्त अजितेन्द्रिय पुरूषों के लिये इसका दृष्टिगोचर होना अत्यन्त ही कठिन है। आप साक्षात् भगवान् हैं और इस प्रकार स्पष्टतया हमारे नेत्रों के सामने प्रकट हुए हैं। हम आपको प्रणाम करते हैं।’

‘ब्राह्मणों की पवित्र चरण-रज को मैं अपने मुकुट पर धारण करता हूँ।’ श्रीभगवान् ने अपनी संगीतमय एवं अत्यन्त मधुर वाणी में कहा। ‘जय-विजय ने मेरा अभिप्राय न समझकर आप लोगों को अपमान किया है। इस कारण आपने इन्हें दण्ड देकर सर्वथा उचित ही किया है।’

लोकों के उद्धार के लिए लोक-पर्यटन करने वाले, सरलता एवं करूणा की प्रतिमूर्ति सनकादि कुमारों ने श्रीभगवान् की सारगर्भित मधुर वाणी का मर्म समझ लिया। उन्होंने उनसे अत्यन्त विनीत स्वर में कहा-‘हे सर्वेश्वर! इन द्वारपालों को आप जैसा उचित समझे, वैसा दण्ड दें अथवा पुरस्कार रूप में इनकी वृत्ति बढ़ा दें-हम निष्कपट भाव से सब प्रकार आपसे सहमत हैं।

अथवा हमने आपके इन निरपराध अनुचरों की शाप दिया है, इसके लिये हमें ही उचित दण्ड दें। हमें वह भी सहर्ष स्वीकार होगा।’ भगवान मुस्कुराए। ‘यह मेरी प्रेरणा से ही हुआ है।’ श्रीभगवान् ने उन्हें संतुष्ट किया।

इसके बाद सनकादि मुनियों ने सर्वांगसुन्दर भगवान् विष्णु और उनके धाम का दर्शन किया और प्रभु की परिक्रमा कर उनका गुणगान करते हुए वे चारों कुमार लौट गये। भगवान् के पार्षद जय-विजय इन मुनियों के शाप से तीन जन्मों तक क्रमशः हिरण्यकशिपु-हिरण्याक्ष, रावण-कुम्भकर्ण और शिशुपाल-दन्तवक्त्र हुए।

एक समय जब भगवान् सूर्य की भाँति परम तेजस्वी सनकादि मुनि आकाश मार्ग से भगवान के अंशावतार महराज पृथु के समीप पहुँचे, तब उन्होंने अपना अहोभाग्य समझते हुए उनकी सविधि पूजा की। उनका पवित्र चरणोदक अपने माथे पर छिड़का और उन्हें सुवर्ण के सिंहासन पर बैठाकर बद्धाजंलि हो विनयपूर्वक उन मुनियों से निवेदन किया-

‘मंगलमूर्ति मनुीश्वरो! आपके दर्शन तो योगियों को भी दुर्लभ हैं, मुझसे ऐसा क्या पुण्य बना है, जिसके फलस्वरूप आज मुझे स्वतः आपका दर्शन प्राप्त हुआ। ब्रह्माण्ड के इस दृश्य-प्रपंच के कारण महत्तत्त्वादि यद्यपि सर्वगत हैं, तो भी वे सर्वसाक्षी आत्मा को नहीं देख सकते, इसी प्रकार से यद्यपि आप समस्त लोकों में विचरते रहते हैं, तो भी अनधिकारी लोग आपको नहीं देख पाते।’ फिर अपने सौभाग्य की सराहना करते हुए महराज पृथु ने अत्यन्त आदरपूर्वक उनसे कहा-

‘आप संसारानल से संतप्त जीवों के परम सुहृद् हैं, इसलिये आपमें विश्वास करके मैं यह पूछना चाहता हूँ कि इस संसार में मनुष्य का किस प्रकार सुगमता से कल्याण हो सकता है ?’ भगवान् के अवतार सनकादि मुनियों ने आदिराज पृथु का ऐसा प्रश्न सुनकर उनकी बुद्धि की प्रशंसा की और उन्हें विस्तारपूर्वक कल्याण का उपदेश देते हुए कहा-

‘धन और इन्द्रियों के विषयों का चिन्तन करना मनुष्य के सभी पुरूषार्थों का नाश करने वाला है, क्योंकि इनकी चिन्ता से वह ज्ञान और विज्ञान से भ्रष्ट होकर, इन्ही (इन्द्रिय भोगों) में निरत होता हुआ, वृक्षादि स्थावर योनियों में जन्म पाता है। इसलिये जिसे अज्ञानान्धकार से पार होने की इच्छा हो, उस पुरूष को विषयों में आसक्ति कभी नहीं करनी चाहिये, क्योंकि यह धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष की प्राप्ति में बड़ी बाधक है।’

‘जो लोग मन और इन्द्रिय रूप मगरों से भरे हुए इस संसार-सागर को योगादि दुष्कर साधनों से पार करना चाहते हैं, उनका उस पार पहुँचना कठिन ही है; क्योंकि उन्हें कर्णधार रूप श्रीहरि का आश्रय नहीं है। अतः तुम तो भगवान के आराधनीय चरण-कमलों को नौका बनाकर अनायास ही इस दुस्तर दुःख-समुद्र को पार कर लोगे। भगवान सनकादि के इस अमृतमय उपदेश से आप्यायित होकर आदिराज पृथु ने उनकी स्तुति करते हुए पुनः उनकी श्रृद्धा-भक्तिपूर्वक सविधि पूजा की।

फिर आया कल्प का अंत। ऋषिगण, कल्पान्त में हुई प्रलय के कारण पिछले कल्प का आत्मज्ञान भूल गये थे। श्री भगवान ने अपने इस अवतार (सनकादी मुनियों के अवतार) में उन्हें यथोचित उपदेश दिया, जिससे उन लोगों ने शीघ्र ही अपने हृदय में उस तत्त्व का साक्षात्कार कर लिया।

सनकादि मुनि अपने योगबल से अथवा ‘हरिः शरणम्’ मंत्र के जप-प्रभाव से सदा पाँच वर्ष के ही कुमार बने रहते हैं।

ये प्रमुख योगवेत्ता, सांख्यज्ञान-विशारद, धर्मशास्त्रों के आचार्य तथा मोक्षधर्म के प्रवर्तक हैं। श्रीनारद जी को इन्होंने श्रीमदभागवत का उपदेश किया था भगवान सनत्कुमार ने ऋषियों के तत्त्वज्ञान-सम्बन्धी प्रश्न के उत्तर में सुविस्तृत उपदेश देते हुए बताया था-‘विद्या के समान कोई नेत्र नहीं है।

सत्य के समान कोई तप नहीं है। राग के समान कोई दुःख नहीं है और त्याग के समान कोई सुख नहीं है। पापकर्मों से दूर रहना, सदा पुण्यकर्मों का अनुष्ठान करना, श्रेष्ठ पुरूषों के-से बर्ताव और सदाचार का पालन करना-यही सर्वोत्तम कल्याण का साधन है।’

प्राणिमात्र के सच्चे शुभाकांक्षी सनकादि मुनियों के पावन चरण-कमलों में कोटि-कोटि प्रणाम् !

Tuesday, March 9, 2021

कृतज्ञता

कृतज्ञता एक महान गुण है। कृतज्ञता का अर्थ है अपने प्रति  हुई श्रेष्ठ और उत्कृष्ट सहायता के लिए श्रद्धावान होकर दूसरे व्यक्ति के समक्ष सम्मान प्रदर्शन करना। हम अपने प्रति कभी भी और किसी भी रूप में की गई सहायता के लिए आभार प्रकट करते हैं और कहते हैं कि 'हम आप के प्रति कृतज्ञ हैं, ऋणी हैं और इसके बदले हमें जब भी कभी अवसर आएगा, अवश्य ही सेवा करेंगे।' कृतज्ञता मानवता की सर्वोत्कृष्ट विशेषता है। यह हमें आभास कराती है कि प्रत्यक्ष और परोक्ष किसी भी रूप में और कभी भी यदि किसी व्यक्ति ने कोई सहयोग और सहायता प्रदान की है, तो उसके लिए यदि कुछ न कर सके, तो हृदय से आभार अवश्य प्रकट करें। वहीं कृतघ्नता इसके विपरीत एक आसुरी वृत्तिहै, जो इंसान को इंसानियत से जुदा करती है।
कृतज्ञता को और विस्तार से समझते है- कृतज्ञता क्या होता है क्या आपने कभी इसे समझने की कोशिश की है, आज इस युग में लोग कृतज्ञता प्रकट तो करते है लेकिन सिर्फ "Thanks" के रूप। क्या धन्यवाद मात्र कहने से कृतज्ञता प्रकट हो जाती है। या कुछ और है। आज हम कृतज्ञता को समझने की कोशिश करेंगे। 
 कृतज्ञता का अर्थ - कृतज्ञता, प्रत्येक विशेष मनुष्य का महान गुण होता है। यहाँ विशेष मनुष्य उस व्यक्ति को कहा जाता है जो वास्तव में इसे समझता है। अपनी वाणी से कृतज्ञता प्रकट करना और आत्मा से अपने आप को समर्पित करना दोनों भिन्न हो सकती है। लेकिन वास्तव में अपनी आत्मा और ह्रदय से समपर्ण करना ही कृतज्ञता प्रकट करना होता है, जिसे वाणी के द्वारा ही प्रकट किया जाता है। और वचन दिया जाता है। की हम आपके कृतज्ञ है, और इस जीवन में प्रभु ने कोई भी अवसर दिया तो इस वचन का पालन अवश्य करेंगे। 
 वेदो में कृतज्ञता का वर्णन - वेदो में कृतज्ञता को परिभाषित करने के लिए भिन्न भिन्न उदाहरण के द्वारा मानव को समझाया गया है। जैसे - मनुष्य देवी देवताओ की पूजा करता है, जिससे देवताओ को शक्ति मिलती है, उसके बदले में देवता भी कृतज्ञ होकर मनुष्य के सुख दुःख में साथ खड़े रहते है।
  जैसे श्री राम की सहायता करोड़ो बनारो ने की थी, जब युद्ध ख़त्म हुआ, रावण का उद्दार हुआ उसके बाद श्री राम ने सब वानर सेना के प्रति कृतज्ञ हुए और सभी को गोलोक और मोक्ष की प्राप्ति हुयी। 

वैदिक काल में कृतज्ञता का वर्णन - वैदिक काल में जब वेदो की रचना हो रही थी, तब गुरुओ ने सबसे ज्यादा कृतज्ञता प्रकृति के प्रति दिखाने पर ज्यादा बल दिया। इसलिए हमें नदियों, वृक्षों, पहाड़ो, पत्थरो, सूर्य, चंद्र, वायु, खेत, अन्न आदि की वंदना सिखाई गयी। क्युकी मनुष्य जितनी तेज़ी से किसी भी वस्तृ विशेष का दोहन करता है, उतना वापस नहीं करता और वो ऋणी हो जाता है। ऋणी व्यक्ति या मनुष्य कभी किसी का भला नहीं कर सकता और इससे कुछ राहत पाने के लिए कृतज्ञता का विशेष महत्व है। कृतज्ञता दिव्य प्रकाश है। यह प्रकाश जहां होता है, वहां देवताओं का वास माना जाता है। कृतज्ञता दी हुई सहायता के प्रति आभार प्रकट करने का, श्रद्धा के अर्पण का भाव है। जो दिया है, हम उसके ऋणी हैं, इसकी अभिव्यक्ति ही कृतज्ञता है और अवसर आने पर उसे समुचित रूप से लौटा देना, इस गुण का मूलमंत्र है। इसी एक गुण के बल पर समाज और इंसान में एक सहज संबंध विकसित हो सकता है, भावना और संवेदना का जीवंत वातावरण निर्मित हो सकता है। कृतज्ञता एक पावन यज्ञ है। 
'गीताकार' ने कहा है कि तुम लोग इस यज्ञ के द्वारा देवताओं को उन्नत करो और देवता तुम लोगों को उन्नत करें। इस प्रकार नि:स्वार्थ भाव से एक दूसरे को उन्नत करते हुए तुम लोग परम कल्याण को प्राप्त हो जाओगे। गीता के इस श्लोक में कृतज्ञता का स्वरूप स्पष्ट रूप से परिलक्षित होता है। जो दे, उससे लाभ लेकर उसको भी बदले में यथासंभव दें। यज्ञ से दैवीय शक्तियां प्रसन्न होती हैं और देवता यज्ञ करने वाले को समृद्ध कर देते हैं।
 कृतघ्न कभी संतुष्ट नहीं हो सकता और वह सुखी भी नहीं हो सकता है। वह सदा अपने प्रति दिए गए सहयोग को संशय की दृष्टि से देखता है और यह जताता है कि उसके प्रति कितना गलत किया गया है। वह सर्वाधिक बुरा उनका करता है, जो उसे सहयोग देने वाले होते हैं। इसकी परिणति होती है कि एक दिन उसके प्रति सभी लोग सहयोग करना बंद कर देते हैं।

संयम

संयम हर व्यक्ति का वो आभूषण है जिसकी चमक व्यक्ति के जीवित रहने से लेकर उसके मरने के बाद तक रहती है। संयम को हर व्यक्ति के लिए सांसारिक भोग और सम्पूर्ण त्याग के मध्य का भाग कह सकते है। यह अपने ही खिलाफ युद्द नहीं होता, बल्कि यह एक सिर्फ साधारण सा नियम पालन है, जिसे किसी भी मूल्य पर न तोडा जाये। इस नियम का जितने बार पालन करेंगे उतने बार आपको परमशान्ति और सुख की प्राप्ति होती है। आध्यात्मिक दृष्टि से संयम आत्मा प्रमुख का गुण है। इसे आत्मा का एक सहज स्वभाव माना गया है। संयम मानव के शरीर की मुक्त भोग और पूर्ण त्याग के मध्य आत्मनियंत्रण की स्थित होती है, जिसमें व्यवहारिक जीवन और आध्यात्मिक साधनाओं को सफल बनाने के लिए इसे अनिवार्य माना गया है। 
आध्यात्मिक दृष्टि से संयम आत्मा का गुण है। इसे आत्मा का सहज स्वभाव माना गया है। संयम शून्य अबाध भोग से इन्द्रियों की तृप्ति संभव नहीं है। संयम मुक्त इंद्रिय व्यक्ति एवं समाज को पतन की ओर अग्रसर होता है।
संयम हर व्यक्ति का वो आभूषण है जिसकी चमक व्यक्ति के जीवित रहने से लेकर उसके मरने के बाद तक रहती है। संयम को हर व्यक्ति के लिए सांसारिक भोग और सम्पूर्ण त्याग के मध्य का भाग कह सकते है। यह अपने ही खिलाफ युद्द नहीं होता, बल्कि यह एक सिर्फ साधारण सा नियम पालन है, जिसे किसी भी मूल्य पर न तोडा जाये। । इस नियम का जितने बार पालन करेंगे उतने बार आपको परमशान्ति और सुख की प्राप्ति होती है। आध्यात्मिक दृष्टि से संयम आत्मा प्रमुख का गुण है। इसे आत्मा का एक सहज स्वभाव माना गया है। मानव जीवन में ऐसे कई नियम है जिनके द्वारा मानवीय जीवन को सुखद बनाया जा सकता है। लेकिन प्रेम से, सुखद चित्त होकर नियम पालन करने पर। संयम जिनके पास नहीं होता ? जिनके पास संयम नहीं होता है वो जीवन पर्यन्त अपनी इन्द्रियों / इच्छाओं के गुलाम बने रहते है और उन्ही को संतुष्ट करने में लगे रहते है। लेकिन इच्छाओं की पूर्ति कभी भी संभव नहीं होती। इन्द्रियों की भूख नित्य बढ़ती ही रहती है, इस प्रकार मनुष्य इन्द्रियों का गुलाम बनकर अपने जीवन का बहुमूल्य समय बर्वाद करता रहता है। संयम से रहित इंद्रिय या इच्छा उस व्यक्ति एवं समाज को हमेशा पतन की ओर अग्रसर करती है। तो क्या इच्छाओं का दमन करना ही संयम है? नहीं, नास्तिक व्यक्ति हमेशा समाज को अपने झूट के कुचक्र में उलझाने में लगा रहता है। क्युकी वो खुद झूठ की दुनियां में रहकर अपने आप को ज्ञानी समझता है। 
संयम और दमन में दोनों ही शब्दों और उनके कर्मो में बहुत बड़ा अन्तर है। संयम में नियंत्रण है, एक मर्यादा है, एक निश्चित भावना है। जबकि दमन का अर्थ दबाना है। बहुत सी साधनाओं में साधक द्वारा अपनी वृत्तियों को दबाने के बजाय नियंत्रित करने को कहा जाता है। 
     संयम की कुछ व्यावहारिक परिभाषा उदाहरण के लिए - एक विद्यार्थी को सदैव अपने भोजन करने की आदत में नियंत्रण या संयम की आवश्यकता होती है। क्युकी ज्यादा खाने से उसे आलस घेरेगा जो उसकी पढाई और एकाग्र चित्त को नष्ट करेगा। यहाँ संयम करना आवश्यक है। किन्तु भोजन का त्याग करना अपनी इच्छाओं और इन्द्रियों अर्थात भूख का दमन करना गलत है। विद्यार्थी दमन को अपनाकर भी अपनी बुद्धि को एक चित्त नहीं कर सकता। इन शब्दों की जटिल परिभाषा हो सकती हैं परन्तु आम जीवन में कैसे महसूस होती हैं, 
आत्मनियंत्रण - आत्मनियंत्रण किसी उद्देश्य की प्राप्ति के लिए प्रदर्शित की गई भावना, कामना और व्यवहार पर नियंत्रण की क्षमता है। मनो-विज्ञान में इसे स्वनियंत्रण भी कहा गया है। हम साधारण जीवन में आत्मनियंत्रण को इन तीन तरह से ज्यादा पाते है। 
  सहनशीलता - जैसे ही आप पानी पीने चले, कोई आया वो आपकी बोतल से पानी पीकर चला गया। आप प्यासे रह गए। इसके बाद भी आपका चित्त शांत रहता है। न व्यक्ति के बारे में बुरा सोचते है। और न अपने भाग्य के बारे में। यही सहनशीलता है। 
 संयम - किसी चीज के उपलब्ध होने पर भी सिर्फ अपने नियमों के पालन हेतु उसका उपभोग नहीं करना संयम है. आसान शब्दों मेंं कहा जाय तो, आपके घर के फ्रिज में चॉकलेट है, आप अकेले है, खा सकते है। लेकिन आप नहीं खाते क्युकी आपको मिल-बाँट कर खाना पसंद है। माता-पिता से पूछकर खाना पसंद है। ये संयम है, की चॉकलेट आपके पास है फिर भी इसको खाने का विचार त्याग दिया। 
 धैर्य - किसी विषम परस्थिति में अपने अंदर नकारात्मक विचार पर संयम रखना और सकारात्मक ही सोचना और उसके अनुरूप कर्म करना ही सच्चा धैर्य है। मानव जीवन के दस लक्षण हैं, 
      धर्माचारी को ये 10 आभूषण अवश्य धारण करने चाहिए। चाहे वो किसी भी धर्म का हो। 
 ▪क्षमा
 ▪आत्म-नियंत्रण
 ▪चोरी न करना
 ▪पवित्रता 
▪इन्द्रिय-संयम
▪बुद्धि, 
▪विद्या, 
▪सत्य 
▪क्रोध न करना

Monday, March 8, 2021

इस ग्रह पर कुछ स्थान ऐसे हैं जहाँ गुरुत्वाकर्षण काम नहीं करता है

हालाँकि, इस ग्रह पर कुछ स्थान ऐसे हैं जहाँ गुरुत्वाकर्षण काम नहीं करता है। आइये जानते है उस जगहों के बारे में 1- सोने का पत्थर - म्यामार
छवि स्त्रोत:- गूगल इस सुनहरी चट्टान को कियतिओयो पैगोडा के रूप में जाना जाता है और बौद्ध धर्म के अनुयायियों के लिए इस स्थल का बहुत अधिक महत्व है। चट्टान को देखने के बाद, किसी को यह महसूस हो सकता है कि यह कभी भी नीचे गिर सकता है लेकिन यह 2500 से अधिक वर्षों से ऐसे ही रखा है। लोगों का मानना ​​है कि यह चट्टान इस तरह से आयोजित की गई है क्योंकि इसमें बुद्ध के बाल हैं लेकिन सिर्फ महिलाएं इसे स्थानांतरित कर सकती हैं। यही कारण है कि महिलाओं को चट्टान के पास जाने की अनुमति नहीं है और यह सुनिश्चित करने के लिए, अधिकारियों द्वारा गार्डों को नियुक्त किया गया है। 2- उल्टा बहता पानी का झरना - इंग्लैंड
छवि स्त्रोत:- गूगल यह अविश्वसनीय लगता है लेकिन यह सच है कि एक झरना है जो उल्टे तरीके से बहता है जिसका मतलब नीचे से ऊपर की ओर है। यह झरना डर्बीशायर पीक जिले के हेयफील्ड के पास है। यह देखा जाता है कि किंडर नदी एक निश्चित बिंदु तक नीचे की ओर बहती है और फिर ऊपर की ओर बहने लगती है। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि हवा का दबाव इतना तेज होता है कि यह पानी को ऊपर की ओर बहने के लिए मजबूर करता है। 3- ओरेगॉन भंवर, रहस्यों का घर
छवि स्त्रोत:- गूगल यह एक प्रसिद्ध पर्यटन स्थल है जो अब गोल्डेन हिल, ओरेगन में सड़क के किनारे पर है, और लोग असामान्य चीजों का अनुभव करने के लिए वर्तमान समय में यहां आना पसंद करते हैं। हालाँकि मामला पुराने दिनों में ऐसा नहीं था क्योंकि स्थानीय लोगों द्वारा इस स्थान को निषिद्ध घोषित किया गया था। यहाँ पर एक झाड़ू है जो कभी भी इस तरह से नहीं पड़ी है कि इसे किस तरह रखा जाए और सपाट सतहों पर भी गोल उछलें। कई लोगों ने अजीब घटनाओं के कारण का पता लगाने के लिए विशेष उपकरणों का उपयोग किया है, लेकिन कोई भी आज तक सफल नहीं हुआ है। 4- हुवर बांध - नेवादा
छवि स्त्रोत:- गूगल हूवर बांध को 1947 तक बोल्डर बांध के रूप में जाना जाता था और यह दो अमेरिकी राज्यों- नेवादा और एरिज़ोना पर सीमा पर बनाया जा रहा है। यह एक आर्च के आकार का बांध है जो कोलोराडो नदी के ब्लैक कैनियन पर बनाया गया है और यह 726.4 फीट लंबा है। यह देखने के लिए कि गुरुत्वाकर्षण वहाँ पर काम करता है या नहीं, एक व्यक्ति को एक सरल प्रयोग करने की आवश्यकता है। जब बोतल से पानी बांध में गिराया जाता है, तो नीचे की ओर बहने के बजाय, पानी ऊपर की ओर बहता है। उम्मीद करता हूं आपको उत्तर पसंद आया होगा। पढ़ने के लिए धन्यवाद

घर से सांप भगाने का देशी तरीका

वर्षा ऋतु के प्रारंभ होने के साथ ही विषधर सर्पों के दंश से शहर हो या गाँव सभी भयभीत रहते हैं। सर्प विशेषज्ञों को बुलाने के अतिरिक्त अन्य कोई उपाय नहीं होता है। वहीं अत्यधिक व्यस्तता के कारण ये लोग सही समय और दूरी के कारण समय पर पहुंच नहीं पाते हैं अतः चेष्टा करुंगी कुछ घरेलू उपाय बताकर सहायता करने की घर से सांप भगाने के लिए आप स्नैक कैचर को कॉल करके बुला सकते हैं। किंतु कभी-कभी ऐसा भी होता है कि आपात कालीन स्थिति हो जाय और घर पर कोई ना हो और यदि सांप से सुरक्षा चाहते हैं तो उसके लिए सामान्य उपाय कर सकते हैं। नाग दौना का पौधा- छत्तीसगढ़ में इसे दौना पत्ता भी कहते हैं। नाग दौन का पौधा अपने आंगन में लगा लीजिए। नाग दोन के पौधे में एक तरह का तेज गंध पाया जाता है। जो सर्प को इस पौधे के निकट आने से रोकता है अतः आप इस पौधे को घर पर लगाकर आसानी से स्वयं की एवं अपने आस-पास सांपो को आने से रोक सकते हैं। जिससे हम तो सुरक्षित रहेंगे ही और सबसे अधिक हमारे मित्र सांप सुरक्षित रहेंगे। ये बात मैंने इसलिए लिखी है क्योंकि लोग छोटे से सांप ( 2से 3 फीट) को देखकर ही मार देते हैं जो बहुत दुखद है।

 

गरुड़ फल - यह अमरकंटक और सतपुड़ा के जंगलों में पाया जाने वाला दुर्लभ वृक्ष है। किंतु नर्सरी में मिल जाएगी। या आप जब भी अमरकंटक जाइए कृप्या इसे लाना ना भूलिए। तक्षक सर्प की तरह दिखता है। इसे देखकर सर्प घर में प्रवेश नहीं करते हैं। अतः इसे घर के प्रवेश द्वार पर ही लटकाकर रखें। कहते हैं इसे रखने से सर्प घर में प्रवेश नहीं करते हैं।










 


सर्प गंधा - यह पौधा गमले में या भूमि पर आसानी से लगाई जा सकती है। आयुर्वेद में एक ऐसे पौधे की पूर्ण जानकारी है। यह आकार में छोटे होते हैं साथ ही इसमें सिंदूरी रंग के फूल निकलते हैं जो देखने में बहुत सुंदर होते हैं। इसके अनुसार इस पौध से निकलने वाली गंध भी अत्यंत तीखी होती है जिसके गंध से कहते हैं सामान्य सर्प इसके पास तक नहीं फटकते हैं। इसी विशेष गुण के कारण इसे सर्प गंधा कहते हैं।

आप इसे नर्सरी से लाकर अपने घर के आंगन में अवश्य लगाइए। नोट - सांप खेतों में आने चूहों और कीटों को खाकर हमारे अनाज की रक्षा करते हैं। अतः वह भक्षक नहीं हमारे रक्षक हैं। हमारे मित्र हैं, समय रहते उनकी रक्षा करिए। उन्हें मत मारिए। मत मारिए…… 🙏🙏💐

आयुर्वेदिक पौधे- ब्राह्मी के फायदे

दुनिया भर में कई प्रकार की जड़ी-बूटियां पाई जाती हैं, जो चिकित्सा के क्षेत्र में कई गंभीर बीमारियों का उपचार करने में कारगर हैं। इन जड़ी-बूटियों में किसी की जड़, किसी के फल, किसी के फूल तो किसी की छाल दवाई बनाने के काम आती है। इस आर्टिकल में हम ऐसी ही जड़ी-बूटी ब्राह्मी के बारे में बताता हूँ। इस आयुर्वेदिक पौधे का एक-एक हिस्सा औषधि के रूप में उपयोग किया जाता है। इस लेख में आपको ब्राह्मी के फायदे, उपयोग और नुकसान के बारे में जानने को मिलेगा।
चित्र स्रोत: गूगल इमेजज 
 आइए, सबसे पहले हम सेहत के लिए ब्राह्मी के फायदे जानते हैं। सेहत/स्वास्थ्य के लिए ब्राह्मी के फायदे – Health Benefits of Brahmi in Hindi प्राचीन काल से चिकित्सा के क्षेत्र में ब्राह्मी जड़ी बूटी का उपयोग किया जा रहा है। इसके तमाम गुणों का ही परिणाम है कि वैज्ञानिक निरंतर शोध कर रहे हैं। साइंटिस्ट यह जानने में जुटे हैं कि मानव स्वास्थ्य के लिए और किस-किस प्रकार से ब्राह्मी के फायदे मिल सकते हैं। 
यहां हम बता रहे हैं कि ब्राह्मी किस प्रकार हमें स्वस्थ रखने में कारगर है। 
 1. अल्जाइमर ब्राह्मी में एंटीऑक्सीडेंट, एंटी-इंफ्लेमेटरी व एंटीकॉन्वेलसेंट गुण हाेते हैं। ये गुण मस्तिष्क की कार्यक्षमता में सुधार करते हैं, साथ ही मिर्गी, अनिद्रा और चिंता को दूर करने में कारगर हो सकते हैं। इसके अलावा, ब्राह्मी में मौजूद ये गुण अल्जाइमर यानी याददाश्त कमजोर होने की बीमारी को भी दूर करने में सहायक हो सकते हैं। 
 
2. रक्त संचार के लिए ब्राह्मी चूर्ण ब्राह्मी में पाया जाने वाला नाइट्रिक ऑक्साइड रक्तचाप के खतरे को कम करता है। साथ ही रक्त को पतला भी करता है, जिससे नसों में रक्त का प्रवाह आसानी से हो सकता है।
 
3. चिंता को दूर करे ब्राह्मी जड़ी-बूटी चिंता और तनाव को कम करने में मदद कर सकती है। इसे एक एडाप्टोजेनिक जड़ी-बूटी माना जाता है यानी यह शरीर के तनाव को दूर करने में कारगर हो सकती है। 

4. कैंसर के लिए ब्राह्मी के गुण ब्राह्मी जड़ी बूटी में एंटीकैंसर गुण होते हैं। इस कारण से यह मस्तिष्क के ट्यूमर की कोशिकाओं को मारने के साथ ही स्तन कैंसर और कोलन कैंसर की हानिकारक कोशिकाओं के विकास को रोकने के लिए सहायक हो सकती है। 

5. दर्द में ब्राह्मी तेल के फायदे ब्राह्मी को दर्द निवारक के रूप में भी उपयोग किया जा सकता है। इसमें पाया जाने वाला एंटीनोसिसेप्टिव गुण इसे दर्द निवारक औषधि के रूप में पेश करता है। इस गुण के कारण ब्राह्मी को न्यूरोपैथिक दर्द की स्थिति में इलाज के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है।

6. प्रतिरक्षा प्रणाली में सुधार ब्राह्मी प्राकृतिक रूप से आपकी प्रतिरक्षा प्रणाली को बढ़ाने में मदद कर सकती है। ब्राह्मी का सेवन करने से शरीर को मजबूत तो मिलती ही है, साथ ही इसमें मौजूद एंटीऑक्सिडेंट गुण के कारण प्रतिरक्षा प्रणाली भी बेहतर होती है। इस कारण शरीर विभिन्न प्रकार की बीमारियों का सामना कर सकता है। 

 7. शुगर को नियंत्रित करने में ब्राह्मी के फायदे ब्राह्मी में एंटीऑक्सीडेंट के साथ-साथ एंटीडायबिटिक गुण भी पाए जाते हैं। यही कारण है कि शुगर को नियंत्रित ब्राह्मी कर सकती है। साथ ही इसमें एंटीहाइपरग्लाइसेमिक गुण भी पाया जाता है, जिस कारण टाइप 2 डायबिटीज में ब्राह्मी के सकारात्मक प्रभाव देखे गए हैं। 

 8. पाचन तंत्र को मजबूत करे ब्राह्मी जड़ी बूटी ब्राह्मी विटामिन और मिनरल का अच्छा स्राेत है। इसमें मौजूद फाइबर आंतों में से हानिकारक पदार्थों को साफ करके पाचन तंत्र को मजबूत करता है। साथ ही पाचन प्रणाली को धीमा कर भरपूर ऊर्जा प्रदान करता है और मल की मात्रा को बढ़ाता है। 

9. मिर्गी के लिए ब्राह्मी के उपचार आयुर्वेद में ब्राह्मी का उपयोग सदियों से नर्व टॉनिक के रूप में जैविक और कार्यात्मक नर्वस सिस्टम के विकारों को दूर करने के लिए किया जाता रहा है। वहीं, अगर मिर्गी की बात करें, तो कई आयुर्वेदिक दवा का इस्तेमाल किया जाता है, जिसमें एंटीपीलेप्टिक (मिर्गी को ठीक करने की दवा) गुण पाया जाता है। इस मेंटट नामक दवा में ब्राह्मी भी शामिल है। ऐसे में हम कह सकते हैं कि ब्राह्मी के सेवन से इस रोग को दूर किया जा सकता है और बीमारी के दौरान भी इसका उपयोग करने से फायदा हो सकता है। 

 10. सांस संबंधी स्वास्थ्य के लिए ब्राह्मी के फायदे ब्राह्मी का अर्क या जूस एंटीऑक्सीडेंट और एडेप्टोजेनिक से समृद्ध होता है, जिसके प्रभाव से ब्राह्मी ब्रोंकाइटिस और को दूर करने में कारगर हो सकती है। ब्रोंकाइटिस में श्वासनली में जलन और सूजन होती है, जिस कारण सांस लेने में तकलीफ हो सकती है। 

11. एंटीऑक्सीडेंट ब्राह्मी जड़ी बूटी ब्राह्मी को एंटीऑक्सीडेंट का अच्छा स्रोत माना गया है। अपने इस एंटीऑक्सीडेंट गुण के कारण ही ब्राह्मी शरीर में ऑक्सिडेटिव स्ट्रेस को कम कर सकती है। साथ ही यह ऑक्सिडेंट के हानिकारक प्रभावों को भी कम करने में कारगर हाे सकती है। 

12. मानसिक क्षमता बढ़ाने में मददगार ब्राह्मी को प्राकृतिक एंटीऑक्सीडेंट के रूप में जाना जाता है, जो मस्तिष्क के विकास में न्यूरोप्रोटेक्टिव भूमिका निभा सकता है। इसका उपयोग मानसिक क्षमता बढ़ाने के लिए किया जाता है। यह एकाग्रता, समझ, ज्ञान और सतर्कता को बढ़ाने में मदद करता है। 

13. अन्य बीमारियों में ब्राह्मी के उपचार इस अद्भुत जड़ी-बूटी का उपयोग अस्थमा और ब्रोंकाइटिस जैसी सांस संबंधी समस्याओं के साथ-साथ मिर्गी के इलाज में भी किया जा सकता है। इसका उपयोग मूत्र मार्ग के संक्रमण, उच्च रक्तचाप, रक्त के रोग, गठिया व हेपेटाइटिस के उपचार के लिए भी किया जा सकता है। इसमें एंटीबायोटिक व एंटिफंगल गुण भी मौजूद होते हैं, जो घावों को भरने में उपयोगी माने जाते हैं। 
 14. मूत्रवर्धक ब्राह्मी चूर्ण ब्राह्मी में कई औषधीय गुण पाए जाते हैं, जो हमारे स्वास्थ्य के लिए फायदेमंद हो सकते हैं। इन्हीं गुणों में से मूत्रवर्धक भी इसका एक गुण है, जो शरीर में मौजूद अतिरिक्त पानी को निकाल कर, किडनी स्टोन व अन्य बीमारियों से छुटकारा दिलाने में कारगर हो सकता है। स्वास्थ के बाद त्वचा के लिए ब्राह्मी के फायदों के बारे में जानते हैं। त्वचा के लिए ब्राह्मी के फायदे – Skin Benefits of Brahmi in Hindi ऊपर हमने जाना कि ब्राह्मी के गुण सेहत के लिए कैसे फायदेमंद हो सकते हैं। 
आइए, अब जानते हैं कि ब्राह्मी का उपचार त्वचा के लिए कैसे लाभकारी हो सकता है। 
 1. एस्ट्रिंजेंट के रूप में ब्राह्मी में एस्ट्रिंजेंट गुण पाया जाता है, जो त्वचा के लिए फायदेमंद होता है। कई सौंदर्य प्रसाधनों में एस्ट्रिंजेंट का इस्तेमाल किया जाता है। एस्ट्रिंजेंट त्वचा के रोम छिद्राें को साफ करके, अतिरिक्त तेल को हटाने का काम करता है। कैसे करें उपयोग : ब्राह्मी के अर्क को गुलाब जल के साथ मिलाकर चेहरे पर लगाएं। फिर 5 मिनट के बाद इसे पानी से धो लें। 

 2. झुर्रियों को दूर करें। ब्राह्मी के अंदर पाए जाने वाले पेंटासाइक्लिक ट्राइटरपीन का उपयोग आमतौर पर एंटी रिंकल यौगिक के रूप में किया जाता है, जो चेहरे की झुर्रियों को दूर कर चेहरे को स्वस्थ बनाने में मदद कर सकते हैं। साथ ही इसमें पाया जाने वाला एंटीऑक्सीडेंट गुण , फ्री रेडिकल्स से लड़ने और त्वचा को स्वस्थ बनाए रखने में मदद करने के साथ-साथ। कैसे करें उपयोग : आप ब्राह्मी चूर्ण को पानी के साथ मिलाकर पेस्ट बना लें। फिर आप इसे चेहरे पर फेसपैक की तरह इस्तेमाल करें। 

 3. एंटीसेप्टिक के रूप में ब्राह्मी के उपचार एंटीसेप्टिक के रूप में भी किए जाते हैं। इसमें मौजूद एंटीमाइक्रोबियल गुण कोलेजोन को बढ़ाकर त्वचा को चमकदार और स्वस्थ बनाने के साथ ही त्वचा के रूखेपन, ढीलेपन और झुर्रियाें से छुटकारा दिलाने में मदद कर सकते हैं । कैसे करें उपयोग : ब्राह्मी के तेल की कुछ बूंदें हल्दी और गुलाब जल के साथ मिलाकर चेहरे पर लगाएं। कुछ देर के बाद चेहरे को ठंडे पानी से धो लें। त्वचा के बाद अब जानते हैं कि बालों के विकास के लिए ब्राह्मी का उपयोग कैसे किया जा सकता है। 
 बालों के लिए ब्राह्मी के फायदे – Hair Benefits of Brahmi in Hindi प्राचीन काल से ही औषधि के रूप में ब्राह्मी के गुण के कारण इसका उपयोग कई समस्याओं के समाधान के रूप में होता रहा है। 

आगे हम जानेंगे कि बालों की समस्या को दूर करने के लिए इसका इस्तेमाल कैसे कर सकते हैं। 

1. बालों को झड़ने से रोके ब्राह्मी में पाया जाने वाला एंटीऑक्सीडेंट गुण बालों को झड़ने से । साथ ही यह खून के संचार को ठीक करता है, जिससे बालों की जड़ें मजबूत होती हैं। कैसे करें उपयोग : ब्राह्मी, आंवला और भृंगराज को एक साथ पीसकर मिश्रण बना लें। इस मिश्रण को रात भर तक एक लोहे की कड़ाही में रखें। सुबह इस पेस्ट को अपने बालों पर 10 से 15 मिनट के लिए लगाएं। ऐसा सप्ताह में दो बार करने से बालों का गिरना बंद हो जाता है। 

2. बालों के विकास के लिए ब्राह्मी तेल के फायदे बालों के विकास के लिए भी हैं। ब्राह्मी को विटामिन व मिनरल जैसे पोषक तत्वों का अच्छा स्राेत माना जाता है। साथ ही इसमें एंटीऑक्सीडेंट गुण भी होता है। इन्हीं पोषक तत्वों की वजह से ब्राह्मी का तेल बालों की जड़ों को मजबूती प्रदान करता है, साथ ही उनके विकास में भी मददगार साबित हो सकता है। कैसे करें उपयोग : ब्राह्मी जड़ी बूटी के तेल से रोजाना बालों की मसाज करने से मजबूती और चमक के साथ उनके विकास में फायदेमंद हो सकता है। स्वास्थ्य, त्वचा और बालों के फायदों में उपयोग के बाद अब ब्राह्मी के कुछ अन्य उपयोगों के बारे में जानते हैं। 
 ब्राह्मी का उपयोग – How to Use Brahmi in Hindi ब्राह्मी के कई सारे उपयोग हैं। इसे हम चाय के रूप में, पेस्ट के रूप में, काढ़े के रूप में साथ ही औषधि के रूप में भी उपयोग कर सकते हैं। इसके अलावा, इसके और भी उपयोग हैं, जैसे : इस तेल को जोड़ों के दर्द व सिर दर्द में इस्तेमाल किया जा सकता है। इसकी पत्तियों को पानी में उबाल कर काढ़े के रूप में भी इसका सेवन कर सकते हैं। गर्दन और छाती पर लगाया जाने वाला ब्राह्मी पेस्ट खांसी और निमोनिया में बहुत उपयोगी है। ब्राह्मी लेप (पेस्ट) सूजन को कम करने में मदद करता है। पत्तियों का रस बच्चों में दस्त से राहत देने के लिए चिकित्सक की देखरेख में दिया जाता है। ताजा ब्राह्मी की पत्तियों से बनी चाय में शहद मिलाकर पीने से दिमाग पर सकारात्मक असर होता है। धन्यवाद।

स्वामी विवेकानंद जी

भीषण गर्मी में स्वामी जी एक गांव से गुजर रहे थे। उन्हें प्यास लगी थी। खेत की मेड़ पर बैठे एक व्यक्ति को लोटे से पानी पीते देखकर उन्होंने कहा, भैया, मुझे भी थोड़ा पानी पिला दो। उस ग्रामीण ने भगवा वस्त्रधारी को देखकर सिर झुकाया और बोला, महाराज, मैं निम्न जाति का व्यक्ति आपको अपने हाथ से पानी पिलाकर पाप मोल नहीं ले सकता। स्वामी जी यह सुनकर आगे बढ़ लिए। कुछ ही क्षणों में उन्हें लगा कि उन्होंने संन्यासी बनने के लिए जाति, परिवार और पुरानी प्रचलित गलत मान्यताओं का त्याग कर दिया, फिर आग्रह करके उस निश्छल ग्रामीण का पानी क्यों नहीं स्वीकार किया। उनका जाति अभिमान क्यों जाग उठा? यह तो अधर्म हो गया। वह तुरंत किसान के पास लौटकर बोले, भैया, मुझे क्षमा करना। मैंने तुम जैसे निश्छल परिश्रमी व्यक्ति के हाथों से पानी न पीकर घोर पाप किया है। निम्न जाति तो उसकी होती है, जो दुर्व्यसनी और अपराधी होता है। स्वामी जी ने उसके हाथ से पानी ग्रहण किया। बाद में वह खुलकर ऊंच-नीच की भावना पर प्रहार करते रहे।
2. अपनी भाषा पर गर्व एक बार स्वामी विवेकानंद विदेश गए जहाँ उनके स्वागत के लिए कई लोग आये हुए थे उन लोगों ने स्वामी विवेकानंद की तरफ हाथ मिलाने के लिए हाथ बढाया और इंग्लिश में HELLO कहा जिसके जवाब में स्वामी जी ने दोनों हाथ जोड़कर नमस्ते कहा... उन लोगो को लगा की शायद स्वामी जी को अंग्रेजी नहीं आती है तो उन लोगो में से एक ने हिंदी में पूछा "आप कैसे हैं"?? तब स्वामी जी ने कहा "आई एम् फ़ाईन थैंक यू"उन लोगो को बड़ा ही आश्चर्य हुआ उन्होंने स्वामी जी से पूछा की जब हमने आपसे इंग्लिश में बात की तो आपने हिंदी में उत्तर दिया और जब हमने हिंदी में पूछा तो आपने इंग्लिश में कहा इसका क्या कारण है ??तब स्वामी जी ने कहा. जब आप अपनी माँ का सम्मान कर रहे थे तब मैं अपनी माँ का सम्मान कर रहा था और जब आपने मेरी माँ का सम्मान किया तब मैंने आपकी माँ का सम्मान किया.यदि किसी भी भाई बहन को इंग्लिश बोलना या लिखना नहीं आता है तो उन्हें किसी के भी सामने शर्मिंदा होने की जरुरत नहीं है बल्कि शर्मिंदा तो उन्हें होना चाहिए जिन्हें हिंदी नहीं आती है क्योंकि हिंदी ही हमारी राष्ट्र भाषा है हमें तो इस बात पर गर्व होना चाहिए की हमें हिंदी आती है. क्या आपने किसी देश को देखा है जहाँ सरकारी काम उनकी राष्ट्र भाषा को छोड़ कर किसी अन्य भाषा या इंग्लिश में होता हो.यहाँ तक की जो भी विदेशी मंत्री या व्यापारी हमारे देश में आते हैं वो अपनी ही भाषा में काम करते हैं या भाषण देते हैं फिर उनके अनुवादक हमें हमारी भाषा या इंग्लिश में अनुवाद करके समझाते हैं.जब वो अपनी भाषा नहीं छोड़ते तो हमें हमारी राष्ट्र भाषा को छोड़कर इंग्लिश में काम करने की क्या जरुरत है. 3. देने का आनंद पाने के आनंद से बड़ा भ्रमण एवं भाषणों से थके हुए स्वामी विवेकानंद अपने निवास स्थान पर लौटे। उन दिनों वे अमेरिका में एक महिला के यहां ठहरे हुए थे। वे अपने हाथों से भोजन बनाते थे। एक दिन वे भोजन की तैयारी कर रहे थे कि कुछ बच्चे पास आकर खड़े हो गए.उनके पास सामान्यतया बच्चों का आना-जाना लगा ही रहता था। बच्चे भूखे थे। स्वामीजी ने अपनी सारी रोटियां एक-एक कर बच्चों में बांट दी। महिला वहीं बैठी सब देख रही थी। उसे बड़ा आश्चर्य हुआ। आखिर उससे रहा नहीं गया और उसने स्वामीजी से पूछ ही लिया- 'आपने सारी रोटियां उन बच्चों को दे डाली, अब आप क्या खाएंगे?'स्वामीजी के अधरों पर मुस्कान दौड़ गई। उन्होंने प्रसन्न होकर कहा- 'मां, रोटी तो पेट की ज्वाला शांत करने वाली वस्तु है। इस पेट में न सही, उस पेट में ही सही.' देने का आनंद पाने के आनंद से बड़ा होता है. 4. सच्चा पुरुषार्थ एक विदेशी महिला स्वामी विवेकानंद के समीप आकर बोली: “ मैं आपस शादी करना चाहती हूँ “विवेकानंद बोले: ” क्यों?मुझसे क्यों ?क्या आप जानती नहीं की मैं एक सन्यासी हूँ?”औरत बोली: “मैं आपके जैसा ही गौरवशाली, सुशील और तेजोमयी पुत्र चाहती हूँ और वो वह तब ही संभव होगा जब आप मुझसे विवाह करेंगे”विवेकानंद बोले: “हमारी शादी तो संभव नहीं है, परन्तु हाँ एक उपाय है”औरत: क्या?विवेकानंद बोले “आज से मैं ही आपका पुत्र बन जाता हूँ, आज से आप मेरी माँ बन जाओ…आपको मेरे रूप में मेरे जैसा बेटा मिल जायेगा.औरत विवेकानंद के चरणों में गिर गयी और बोली की आप साक्षात् ईश्वर के रूप है.इसे कहते है पुरुष और ये होता है पुरूषार्थ सच्चा पुरुष सच्चा मर्द वो ही होता है जो हर नारी के प्रति अपने अन्दर मातृत्व की भावना उत्पन्न कर सके. पढ़ने के लिए धन्यवाद

Friday, February 26, 2021

पाषाणभेद या पत्थरचूर (वानस्पतिक नाम : Plectranthus barbatus तथा Coleus forskohlii) एक औषधीय पादप है।

कोलियस फोर्सकोली जिसे पाषाणभेद अथवा पत्थरचूर भी कहा जाता है, उन कुछ औषधीय पौधों में से है, वैज्ञानिक आधारों पर जिनकी औषधीय उपयोगिता हाल ही में स्थापित हुई है। भारतवर्ष के समस्त ऊष्ण कतिबन्धीय एवं उप-ऊष्ण कटिबन्धीय क्षेत्रों के साथ-साथ पाकिस्तान, श्रीलंका, पूर्वी अफ्रीका, ब्राजील, मिश्र, ईथोपिया तथा अरब देशों में पाए जाने वाले इस औषधीय पौधे को भविष्य के एक महत्वपूर्ण औषधीय पौधे के रूप में देखा जा रहा है। वर्तमान में भारतवर्ष के विभिन्न भागों जैसे तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश, महाराष्ट्र, कर्नाटक तथा राजस्थान में इसकी विधिवत खेती भी प्रारंभ हो चुकी है जो काफी सफल रही है।

विभिन्न भाषाओं में पाषाणभेद के नाम-

हिन्दी : पाषाण भेद, अथवा पत्थरचूर
संस्कृत : मयनी, माकन्दी, गन्धमूलिका
कन्नड़ : मक्काड़ी बेरू, मक्काण्डी बेरू अथवा मंगना बेरू
गुजराती : गरमालू
मराठी : मैमनुल
वानस्पतिक नाम : कोलियस फोर्सकोली अथवा कोलियस बार्बेट्स बैन्थ
वानस्पतिक कुल : लैबिएटी/लैमिएसी (Lamiaceae)
गुण: यह औषधि रूप मे बहुत ही गुणकारी है किडनी के सारे रोग इसे दुर होते हैं। यह एक सर्वश्रेष्ठ रक्त अवरोधक भी है। यह औषधि सदियों से भारतवर्ष में ऋषि मुनियों द्वारा प्रयोग मे लिया जाता रहा है ।


Thursday, February 25, 2021

सुन्दर व्यवहार व सुन्दर चेहरा

एक सभा में गुरु जी ने प्रवचन के दौरान एक 30 वर्षीय युवक को खडा कर पूछा कि "आप मुम्बई मेँ जुहू चौपाटी पर चल रहे हैं और सामने से एक सुन्दर लडकी आ रही है, तो आप क्या करोगे" ? युवक ने कहा - उस पर नजर जायेगी, उसे देखने लगेंगे। गुरु जी ने पूछा - वह लडकी आगे बढ गयी , तो क्या पीछे मुडकर भी देखोगे ? लडके ने कहा - हाँ, अगर धर्मपत्नी साथ नहीं है तो। (सभा में सभी हँस पडे) गुरु जी ने फिर पूछा - जरा यह बताओ वह सुन्दर चेहरा आपको कब तक याद रहेगा ? युवक ने कहा 5 - 10 मिनट तक, जब तक कोई दूसरा सुन्दर चेहरा सामने न आ जाए। गुरु जी ने उस युवक से कहा - अब जरा कल्पना कीजिये.. आप जयपुर से मुम्बई जा रहे हैं और मैंने आपको एक पुस्तकों का पैकेट देते हुए कहा कि मुम्बई में अमुक महानुभाव के यहाँ यह पैकेट पहुँचा देना... आप पैकेट देने मुम्बई में उनके घर गए। उनका घर देखा तो आपको पता चला कि ये तो बडे अरबपति हैं। घर के बाहर 10 गाडियाँ और 5 चौकीदार खडे हैं। उन्हें आपने पैकेट की सूचना अन्दर भिजवाई , तो वे महानुभाव खुद बाहर आए। आप से पैकेट लिया। आप जाने लगे तो आपको आग्रह करके घर में ले गए। पास में बैठाकर गरम खाना खिलाया। चलते समय आप से पूछा - किसमें आए हो ? आपने कहा- लोकल ट्रेन में। उन्होंने ड्राइवर को बोलकर आपको गंतव्य तक पहुँचाने के लिए कहा और आप जैसे ही अपने स्थान पर पहुँचने वाले थे कि उस अरबपति महानुभाव का फोन आया - भैया, आप आराम से पहुँच गए.. अब आप बताइए कि आपको वे महानुभाव कब तक याद रहेंगे ? युवक ने कहा - गुरु जी ! जिंदगी में मरते दम तक उस व्यक्ति को हम भूल नहीं सकते। गुरु जी ने युवक के माध्यम से सभा को संबोधित करते हुए कहा — "यह है जीवन की हकीकत।" "सुन्दर चेहरा थोड़े समय ही याद रहता है, पर सुन्दर व्यवहार जीवन भर याद रहता है।" बस यही है जीवन का गुरु मंत्र... अपने चेहरे और शरीर की सुंदरता से ज़्यादा अपने व्यवहार की सुंदरता पर ध्यान दें.. जीवन अपने लिए आनंददायक और दूसरों के लिए अविस्मरणीय प्रेरणादायक बन जाएगा।