Tuesday, March 9, 2021

कृतज्ञता

कृतज्ञता एक महान गुण है। कृतज्ञता का अर्थ है अपने प्रति  हुई श्रेष्ठ और उत्कृष्ट सहायता के लिए श्रद्धावान होकर दूसरे व्यक्ति के समक्ष सम्मान प्रदर्शन करना। हम अपने प्रति कभी भी और किसी भी रूप में की गई सहायता के लिए आभार प्रकट करते हैं और कहते हैं कि 'हम आप के प्रति कृतज्ञ हैं, ऋणी हैं और इसके बदले हमें जब भी कभी अवसर आएगा, अवश्य ही सेवा करेंगे।' कृतज्ञता मानवता की सर्वोत्कृष्ट विशेषता है। यह हमें आभास कराती है कि प्रत्यक्ष और परोक्ष किसी भी रूप में और कभी भी यदि किसी व्यक्ति ने कोई सहयोग और सहायता प्रदान की है, तो उसके लिए यदि कुछ न कर सके, तो हृदय से आभार अवश्य प्रकट करें। वहीं कृतघ्नता इसके विपरीत एक आसुरी वृत्तिहै, जो इंसान को इंसानियत से जुदा करती है।
कृतज्ञता को और विस्तार से समझते है- कृतज्ञता क्या होता है क्या आपने कभी इसे समझने की कोशिश की है, आज इस युग में लोग कृतज्ञता प्रकट तो करते है लेकिन सिर्फ "Thanks" के रूप। क्या धन्यवाद मात्र कहने से कृतज्ञता प्रकट हो जाती है। या कुछ और है। आज हम कृतज्ञता को समझने की कोशिश करेंगे। 
 कृतज्ञता का अर्थ - कृतज्ञता, प्रत्येक विशेष मनुष्य का महान गुण होता है। यहाँ विशेष मनुष्य उस व्यक्ति को कहा जाता है जो वास्तव में इसे समझता है। अपनी वाणी से कृतज्ञता प्रकट करना और आत्मा से अपने आप को समर्पित करना दोनों भिन्न हो सकती है। लेकिन वास्तव में अपनी आत्मा और ह्रदय से समपर्ण करना ही कृतज्ञता प्रकट करना होता है, जिसे वाणी के द्वारा ही प्रकट किया जाता है। और वचन दिया जाता है। की हम आपके कृतज्ञ है, और इस जीवन में प्रभु ने कोई भी अवसर दिया तो इस वचन का पालन अवश्य करेंगे। 
 वेदो में कृतज्ञता का वर्णन - वेदो में कृतज्ञता को परिभाषित करने के लिए भिन्न भिन्न उदाहरण के द्वारा मानव को समझाया गया है। जैसे - मनुष्य देवी देवताओ की पूजा करता है, जिससे देवताओ को शक्ति मिलती है, उसके बदले में देवता भी कृतज्ञ होकर मनुष्य के सुख दुःख में साथ खड़े रहते है।
  जैसे श्री राम की सहायता करोड़ो बनारो ने की थी, जब युद्ध ख़त्म हुआ, रावण का उद्दार हुआ उसके बाद श्री राम ने सब वानर सेना के प्रति कृतज्ञ हुए और सभी को गोलोक और मोक्ष की प्राप्ति हुयी। 

वैदिक काल में कृतज्ञता का वर्णन - वैदिक काल में जब वेदो की रचना हो रही थी, तब गुरुओ ने सबसे ज्यादा कृतज्ञता प्रकृति के प्रति दिखाने पर ज्यादा बल दिया। इसलिए हमें नदियों, वृक्षों, पहाड़ो, पत्थरो, सूर्य, चंद्र, वायु, खेत, अन्न आदि की वंदना सिखाई गयी। क्युकी मनुष्य जितनी तेज़ी से किसी भी वस्तृ विशेष का दोहन करता है, उतना वापस नहीं करता और वो ऋणी हो जाता है। ऋणी व्यक्ति या मनुष्य कभी किसी का भला नहीं कर सकता और इससे कुछ राहत पाने के लिए कृतज्ञता का विशेष महत्व है। कृतज्ञता दिव्य प्रकाश है। यह प्रकाश जहां होता है, वहां देवताओं का वास माना जाता है। कृतज्ञता दी हुई सहायता के प्रति आभार प्रकट करने का, श्रद्धा के अर्पण का भाव है। जो दिया है, हम उसके ऋणी हैं, इसकी अभिव्यक्ति ही कृतज्ञता है और अवसर आने पर उसे समुचित रूप से लौटा देना, इस गुण का मूलमंत्र है। इसी एक गुण के बल पर समाज और इंसान में एक सहज संबंध विकसित हो सकता है, भावना और संवेदना का जीवंत वातावरण निर्मित हो सकता है। कृतज्ञता एक पावन यज्ञ है। 
'गीताकार' ने कहा है कि तुम लोग इस यज्ञ के द्वारा देवताओं को उन्नत करो और देवता तुम लोगों को उन्नत करें। इस प्रकार नि:स्वार्थ भाव से एक दूसरे को उन्नत करते हुए तुम लोग परम कल्याण को प्राप्त हो जाओगे। गीता के इस श्लोक में कृतज्ञता का स्वरूप स्पष्ट रूप से परिलक्षित होता है। जो दे, उससे लाभ लेकर उसको भी बदले में यथासंभव दें। यज्ञ से दैवीय शक्तियां प्रसन्न होती हैं और देवता यज्ञ करने वाले को समृद्ध कर देते हैं।
 कृतघ्न कभी संतुष्ट नहीं हो सकता और वह सुखी भी नहीं हो सकता है। वह सदा अपने प्रति दिए गए सहयोग को संशय की दृष्टि से देखता है और यह जताता है कि उसके प्रति कितना गलत किया गया है। वह सर्वाधिक बुरा उनका करता है, जो उसे सहयोग देने वाले होते हैं। इसकी परिणति होती है कि एक दिन उसके प्रति सभी लोग सहयोग करना बंद कर देते हैं।

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